गुवाहाटी : जेएनयू में लोकप्रिय छात्र नेता बनकर उभरे कन्हैया कुमार ने 28 सितंबर 2021 को कांग्रेस की सदस्यता ली थी। कांग्रेस ने कन्हैया कुमार को कितनी गंभीरता से लिया था, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी कोई बड़ी राजनीतिक पहचान न होने के बाद भी स्वयं राहुल गांधी उन्हें पार्टी में शामिल कराने के लिए पहुंचे थे। राहुल गांधी से मुलाकात के बाद जब कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने उन्हें पार्टी मुख्यालय में पार्टी का पटका पहनाया था, कन्हैया कुमार ने कहा था कि वे कांग्रेस को बचाने आए हैं। जब पत्रकारों में उनके कांग्रेस को बचाने के बयान पर खुसर-फुसर शुरू हो गई, तब कन्हैया कुमार को महसूस हुआ कि वे शायद कुछ ज्यादा बोल गए हैं। तब उन्होंने अपनी बात को संभालते हुए कहा कि वे सबके प्रयास और सबके साथ से भाजपा को सत्ता से हटाने और कांग्रेस को बचाने की बात कह रहे हैं। उन्होंने कहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा-कांग्रेस के बीच 200 से ज्यादा सीटों पर सीधा मुकाबला था। वे इन्हीं सीटों पर कांग्रेस को मजबूत करने का काम करेंगे। 

चूंकि, जिस दिन कन्हैया कुमार कांग्रेस में शामिल हुए थे, ठीक उसी दिन सुबह ही नवजोत सिंह सिद्धू ने नाराजगी जाहिर करते हुए पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष के पद से इस्तीफा देने का ऐलान तक कर दिया था। इसलिए जब शाम तक कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवाणी और हार्दिक पटेल ने कांग्रेस में आने की घोषणा की, इसे पार्टी के लिए कुछ राहत के तौर पर देखा गया था। (हालांकि जिग्नेश मेवाणी तकनीकी कारणों से कांग्रेस में शामिल नहीं हो पाए, लेकिन उन्होंने अपना समर्थन दिया और यही संदेश दिया कि वे अगला चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ेंगे)। पार्टी का मानना था कि यदि नवजोत सिंह सिद्धू जैसे लोग कांग्रेस से दूर जा रहे हैं, तो जिन युवाओं को लोकतंत्र की चिंता है, वे कांग्रेस की तरफ आ भी रहे हैं। कहा गया कि इन्हीं युवाओं के सहारे राहुल गांधी अपनी नई कांग्रेस खड़ी करेंगे और भाजपा को चुनौती देंगे। इसी प्रकार जब पप्पू यादव ने अपनी जन अधिकार पार्टी का कांग्रेस में विलय किया, उन्होंने कांग्रेस को मजबूत करने की बात कही थी।

हालांकि, अब उनकी दावेदारी वाली पूर्णिया लोकसभा सीट सहित सुपौल और मधेपुरा भी राजद के खाते में जा चुकी है। यानी पप्पू यादव के लिए कोई वैकल्पिक सीट भी नहीं छोड़ी गई है, जहां से वे अपनी किस्मत आजमा सकें। कांग्रेस में चर्चा है कि यह सब अकारण नहीं हो रहा है। कन्हैया कुमार और पप्पू यादव की दावेदारी वाली सभी सीटों का राष्ट्रीय जनता दल के पास चले जाना, एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पर्दे के पीछे इस खेल के असली खिलाड़ी के तौर पर लालू प्रसाद यादव को देखा जा रहा है। वामदलों की पृष्ठभूमि से कांग्रेस में आए और एक महत्वपूर्ण पद पर काम कर रहे एक नेता ने कहा कि शुक्रवार 29 मार्च को हुए बिहार महागठबंधन के सीट बंटवारे में लालू प्रसाद यादव ने उस बेगूसराय सीट को अपने कब्जे में कर लिया है, जहां से कन्हैया कुमार लोकसभा चुनाव में उतरना चाहते थे। इससे कन्हैया कुमार की राजनीतिक पारी को बड़ा नुकसान होगा। इसके साथ-साथ कांग्रेस को भी बिहार में लंबे समय में नुकसान होगा।

यानी इस सीट बंटवारे से पार्टी को बिहार में मजबूत करने की संभावनाएं कमजोर हुई हैं। कांग्रेस की नाव डूबने से बचाने आए कन्हैया कुमार अपनी बेगूसराय सीट को भी आरजेडी के खाते में जाने से नहीं रोक पाए। कांग्रेस नेता के अनुसार कन्हैया कुमार की सीट के लिए कांग्रेस नेतृत्व ने कोई लड़ाई नहीं लड़ी, इसके लिए उसे दोष दें या कन्हैया कुमार की कमजोरी को, लेकिन पार्टी को इसका बड़ा नुकसान होने वाला है। उल्लेखनीय है कि लालू प्रसाद यादव किसी ऐसे चेहरे को खड़ा नहीं होने देना चाहते, जो कल तेजस्वी यादव के लिए चुनौती बन सके। चूंकि, कांग्रेस भी उन्हीं मुद्दों की राजनीति करती है, जिस मुद्दे के सहारे आरजेडी की राजनीति चल रही है, यदि बिहार में कोई बड़ा यादव नेता उभरता है, तो बाद में तेजस्वी यादव को चुनौती मिल सकती है। संभवत: यही कारण है कि पप्पू यादव से मुलाकात करने के बाद भी लालू प्रसाद यादव ने उनकी कोई सीट कांग्रेस के पास नहीं छोड़ी। दूसरी ओर  लालू यादव बिहार में अपनी विचारधारा के बीच किसी दूसरे यादव नेता को उभरने नहीं देते।