लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भूटान यात्रा का सामरिक एवं कूटनीतिक दोनों तरह का महत्व है। मोदी ने भूटान की धरती से चीन को कड़ा संदेश दिया है कि वह भारत-भूटान की दोस्ती के बीच खलनायक की भूमिका निभाने से बाज आए। चीन भूटान के साथ कूटनीतिक तरीके से सीमा विवाद को अपने पक्ष में करने की साजिश में लगा हुआ है। भूटान से लेन-देन कर चीन उसके कुछ महत्वपूर्ण हिस्से को हड़पना चाहता है ताकि वह भारत की मजबूत घेराबंदी कर सके। चीन की नजर भारत के सिलीगुड़ी के पास स्थित चिकेन नेक पर है, जो पूर्वोत्तर क्षेत्र को भारत के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। प्रधानमंत्री ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए पिछले 22 एवं 23 मार्च को भूटान का दौरा किया तथा कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं की घोषणा की। जिस तरह पारो हवाई अड्डा से लेकर भूटान की राजधानी थिम्फु तक 45 किलोमीटर तक सड़क के दोनों तरफ लोग मोदी की एक झलक पाने के लिए बेसब्री से इंतजार करते दिखे, उससे लगता है कि वे भूटान में कितने लोकप्रिय हैं। भूटान ने पहली बार किसी गैर-भूटानी को अपने देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया। भूटान नरेश ने प्रधानमंत्री मोदी को यह पुरस्कार अपने हाथों से प्रदान किया। इस मौके पर मोदी ने कहा कि भारत हर संकट की घड़ी में भूटान के साथ मजबूती से खड़ा है। भूटान के प्रधानमंत्री ने मोदी को अपना बड़ा भाई मानते हुए उनसे सहयोग की अपील की। दोनों देशों के बीच कुल सात समझौतों पर हस्ताक्षर किये गए, जिसमें दोनों देशों के बीच दो रेल रूट बनाने की बात भी शामिल है। इसके अलावा पर्यावरण, ऊर्जा एवं अन्य कई क्षेत्रों में दोनों देश साथ मिलकर काम करने पर सहमत हो गए हैं। भूटान चाहता है कि भारत गेलेफू के पास एक मेगा सिटी का निर्माण करे, जिस पर भारत ने सहमति दे दी है। भूटान नरेश की पिछली भारत यात्रा के दौरान इस मुद्दे पर भारतीय नेतृत्व के साथ बातचीत हुई थी। 1000 किलोमीटर के दायरे में एक नया शहर बनाने के लिए भूटान पहले से प्रयासरत है। भारत और भूटान को रेल संपर्क से जोड़ने के लिए पहले ही सर्वे का काम पूरा हो चुका है। भूटान का मानना है कि रेल एवं सड़क संपर्क होने के बाद भूटान की पहुंच म्यामां एवं थाईलैंड जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ हो जाएगी। इससे भूटान के व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। इससे भूटान की आमदनी में भी वृद्धि होगी। सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भूटान भारत के लिए जितना महत्वपूर्ण है उतना ही भूटान को भारत की जरुरत है। चीन भूटान को निगलना चाहता है। अगर भूटान को अपनी संप्रभुता को बचाना है तो उसे भारत के साथ खड़ा रहना पड़ेगा। चीन अन्य पड़ोसी देशों की तरह भूटान की जमीन को भी हड़पना चाहता है। पिछले कुछ महीनों में जिस तरह भूटान और चीन के बीच दोस्ती बढ़ी है उससे भारत का चिंतित होना स्वाभाविक है। प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान चीन-भूटान के बीच हो रही कूटनीतिक पहल पर निश्चित रूप से पहल हुई होगी। भारत नहीं चाहता है कि भूटान अपनी भूमि को चीन के हवाले करे। भारत भूटान की सीमा की रक्षा करने तथा विदेश मामलों को संभालने का जिम्मा उठाता रहा है। अगर भारत डोकलाम में भूटान के पक्ष में खड़ा नहीं होता तो चीनी सेना भूटान की जमीन पर सड़क का निर्माण कर डालती। प्रधानमंत्री ने सही समय पर भूटान की यात्रा कर वहां के नरेश एवं सरकार को उचित संदेश दिया है। भारत को हर हालत में भूटान को चीनी खेमे में जाने से बचाना होगा।