गुवाहाटी/नई दिल्ली : संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) लागू किए जाने के खिलाफ आज मंगलवार को सड़क से लेकर न्यायालय तक अभियान देखा गया। असम में जहां इसके खिलाफ विभिन्न संगठनों ने आंदोलन किया तो दूसरी ओर आसू सहित अन्य कई संगठनों देश की सुप्रीम कोर्ट में पहुंचकर न्याय के लिए अंतिम गुहार लगाई।  बताते चलें कि आंदोलनकारियों ने आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के पुतले फूंके और इस कानून की प्रतियां जलाई। असम जातीयतावादी युवा छात्र परिषद (एजेवाईसीपी) ने लखीमपुर में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के पुतले फूंके, जबकि कांग्रेस ने सीएए लागू किए जाने के विरोध में जिले के विभिन्न हिस्सों में इस कानून की प्रतियां जलाईं। राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता देवव्रत सैकिया ने गुवाहाटी स्थित राजभवन के सामने प्रदर्शन किया और सीएए की प्रतियां जलाईं।

माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने भी यहां और कामरूप के रंगिया में प्रदर्शन किया, जबकि विभिन्न कॉलेजों के छात्रों ने शहर में अपने-अपने संस्थानों के बाहर प्रदर्शन किए। शिवसागर जिले में रायजोर दल, कृषक मुक्ति संग्राम समिति और छात्र मुक्ति परिषद के कार्यकर्ताओं और विधायक अखिल गोगोई ने कानून के खिलाफ प्रदर्शन किए तथा केंद्र के खिलाफ नारेबाजी की। कांग्रेस और एजेवाईसीपी की ओर से सीएए की प्रतियां जलाने की क्रमश: बरपेटा और नलबाड़ी से भी सूचना मिली है। असम में 16 दलों के 'यूनाइटेड ऑपजिशन फोरम असम' के 12 घंटे के हड़ताल का ज्यादा असर देखने को नहीं मिला। शिवसागर, गोलाघाट, नगांव और कामरूप जैसे कुछ जिलों में दुकानें एवं व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रहें। अधिकारियों ने मंगलवार को बताया कि असम पुलिस ने विपक्षी दलों को नोटिस जारी कर उनसे हड़ताल वापस लेने को कहा था और चेतावनी दी थी कि यदि वे इस आदेश का पालन करने में नाकाम रहते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

पुलिस महानिदेशक जीपी सिंह ने कहा कि असम पुलिस द्वारा यह सुनिश्चित करने के लिए नोटिस जारी किया गया था कि राज्य में किसी भी आंदोलन के माध्यम से सार्वजनिक संपत्ति को कोई नुकसान न हो और लोगों के जीवन को कोई खतरा न हो। असम पुलिस द्वारा जारी नोटिस की आलोचना करते हुए सैकिया ने कहा कि यह शर्मनाक है कि राज्य पुलिस विभाग भाजपा सरकार के इशारे पर काम कर रही है। दूसरी ओर  अखिल असम छात्र संघ (आसू) ने सुप्रीम कोर्ट से नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) पर रोक लगाने की मांग की। सोमवार को अधिनियम जारी करने के बाद छात्र संघ के नेता सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करने के लिए आज सुबह दिल्ली पहुंचे। आसू नेताओं ने कोर्ट में याचिका दायर करने के बाद मीडिया से कहा कि हालांकि हमारी मुख्य मांग देश को तोडऩे वाले कानून को रद्द करने की है, फिलहाल हम चाहते हैं कि पहले कानून पर रोक लगे और मामले पर जल्द से जल्द सुनवाई हो।

गौरतलब है कि 2019 में भी आसू ने सीएए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की थी। आसू के सलाहकार समुज्ज्वल भट्टाचार्य ने कहा कि अखिल असम छात्र संघ को न्यायालय पर पूरा भरोसा है। अदालती लड़ाई और सड़क की लड़ाई समानांतर रूप से जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि नागरिकता संशोधन कानून पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों पर लागू नहीं होता है। यहां तक कि संविधान के छठे अनुच्छेद के तहत असम के पहाड़ी जिले तथा बोड़ोलैंड में भी यह कानून लागू नहीं होता है। भट्टाचार्य ने सवाल उठाया यदि सीएए पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों और असम के कई हिस्सों के लिए खराब हो सकता है, तो यह कानून असम के अन्य जिलों के लिए कैसे अच्छा हो सकता है? आसू के अध्यक्ष उत्पल शर्मा ने पत्रकारों को बताया कि सीएए को लेकर लोगों का गुस्सा भड़क रहा है और इस आग का असर चुनाव नतीजों पर जरूर पड़ेगा। सरकार भूल गई है कि जनता के पास वोट का हथियार है। इस दौरान संघ के महासचिव शंकरज्योति बरुवा ने कहा कि आसू मंगलवार शाम पूरे असम में मशाल लेकर जुलूस निकालेगी और सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करेगी।

नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (नेसो) हर पूर्वोत्तर राज्य की राजधानियों में सीए अधिनियम और उसके नियमों की प्रतियां जलाएगा। नई दिल्ली से मिली समाचार के मुताबिक उधर उच्चतम न्यायालय में मंगलवार को एक अर्जी दायर कर नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के शीर्ष अदालत के समक्ष लंबित रहने तक नागरिकता संशोधन नियम-2024 के अमल पर रोक लगाने का केंद्र को निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया। इकत्तीस दिसंबर, 2014 से पहले बिना दस्तावेज के भारत आए पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर-मुस्लिम प्रवासियों के लिए त्वरित नागरिकता प्रदान करने से संबंधित नियमों को अधिसूचित करके नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 को लागू किये जाने के एक दिन यह अर्जी दायर की गई है।

नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए) को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं में से एक इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) ने अदालत से यह सुनिश्चित करने का अनुरोध किया है कि पूर्व में दायर रिट याचिकाओं का निपटारा किये जाने तक मुस्लिम समुदाय से संबंधित लोगों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए। सीएए के तहत मुसलमान भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन नहीं कर सकते। याचिका में केंद्र को यह निर्देश देने का शीर्ष अदालत से आग्रह किया गया है कि मुस्लिम समुदाय के लोगों को भी नागरिकता के लिए आवेदन करने की अस्थायी अनुमति दी जाए और उनकी पात्रता पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। 'डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया' ने भी एक पृथक याचिका दायर करके नागरिकता (संशोधन) नियम- 2024 पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया है।

शीर्ष अदालत पहले से ही सीएए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर विचार कर रही है। आईयूएमएल ने अपनी अर्जी में अदालत से नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 और नागरिकता संशोधन नियम, 2024 के विवादित प्रावधानों के निरंतर क्रियान्वयन पर रोक लगाने का आग्रह किया है। इस नियम के परिणामस्वरूप मूल्यवान अधिकार तैयार किये जा रहे हैं और केवल कुछ विशेष धर्म के लोगों को नागरिकता प्रदान की जाएगी, जिसके कारण वर्तमान रिट याचिका के लंबित रहने के दौरान एक अजीब स्थिति उत्पन्न हुई है। नियमों पर रोक लगाने की मांग करते हुए याचिका में कहा गया है कि सीएए के प्रावधानों को चुनौती देने वाली लगभग 250 याचिकाएं शीर्ष अदालत के समक्ष लंबित हैं।