केंद्र सरकार की ओर से किसानों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से अन्न भंडारण योजना शुरू की गई है।  फिलहाल कुल 1450 लाख टन भंडारण की क्षमता है और अब 700 लाख टन भंडारण की क्षमता सहकारिता क्षेत्र में शुरू होगी। इस योजना पर करीब एक लाख करोड़ रुपए का खर्च आएगा। केंद्र का मानना है कि अगले पांच सालों में सहकारिता क्षेत्र में भंडारण क्षमता को तेजी से बढ़ाया जाएगा। इसके बाद भंडारण क्षमता 2,150 लाख टन हो जाएगी। मोदी सरकार के अनुसार यह विश्व की सबसे बड़ी अन्न भंडारण योजना होगी। इस योजना के अंतर्गत 2000 टन का अन्न भंडारण का गोदाम हर ब्लॉक में बनाया जाएगा। जानकार बताते हैं कि सरकार के इस कदम से अन्य की बर्बादी रुकेगी, क्योंकि मौजूदा समय में देश में बड़ी मात्रा में अनाज भंडारण क्षमता की कमी के कारण बर्बाद हो जाता है। इससे आयात पर निर्भरता भी कम होगी और ग्रामीण क्षेत्र में अनाज भंडारण की क्षमता विकसित होने के कारण ग्रामीण लोगों के लिए रोजगार के भी अवसर पैदा होंगे। इस योजना के लागू होने से भारत की खाद्यान्न सुरक्षा भी मजबूत होगी और जगह-जगह स्टोरेज उपलब्ध होने से किसानों की ढुलाई में आने वाली लागत में भी कमी आएगी। उल्लेखनीय है कि भारत में हर साल करीब 3,100 लाख टन खाद्यान्नों का उत्पादन होता है और मौजूदा अन्न भंडारों में केवल 47 प्रतिशत ही उत्पादन का भंडारण हो सकता है। उल्लेखनीय है कि किसानों की अपनी मांगों को लेकर लगातार किए जा रहे विरोध प्रदर्शन के बीच सरकार ने इस परियोजना को प्रस्तुत किया है।  माना जा रहा है कि लंबी अवधि में यह कृृषि क्षेत्र के लिए लाभदायक साबित होगी। यह प्रायोगिक परियोजना 11 राज्यों में प्राथमिक कृृषि ऋ ण समितियों (पैक्स) को लक्षित कर रही है और अनुमान है कि अगले पांच साल की अवधि में सात करोड़ टन खाद्यान्न की भंडारण क्षमता तैयार की जाएगी। यह योजना सीधे तौर पर देश में खाद्यान्न भंडारण क्षमता की कमी को दूर करना चाहती है लेकिन सभी अंशधारकों के लिए इसके कुछ न कुछ लाभ होंगे, इनमें किसान और उपभोक्ता सभी शामिल हैं। खाद्य एवं कृषि संगठन (2021) के आंकड़ों से पता चलता है कि कई देशों में जहां अधिशेष भंडारण क्षमता है, वहीं भारत के साथ ऐसा नहीं है। देश में कुल खाद्यान्न उत्पादन 31.1 करोड़ टन है जबकि कुल भंडारण क्षमता बमुश्किल 14.5 करोड़ टन की है। फिलहाल खाद्यान्न प्रबंधन (खरीद एवं भंडारण) सुविधा भारतीय खाद्य निगम, केंद्रीय भंडारण निगम तथा कई अन्य छोटी-बड़ी सरकारी एजेंसियों के माध्यम से दी जा रही है। इस संदर्भ में पैक्स को गोदाम तैयार करने, कस्टम हायरिंग सेंटर बनाने, प्रसंस्करण इकाइयां तैयार करने तथा उचित मूल्य की दुकानों की प्रक्रिया में शामिल करना वास्तव में भंडारण व्यवस्था के विकेंद्रीकरण की दिशा में उठाया गया कदम है। इससे देशभर में कृृषि क्षेत्र की अधोसंरचना का विकास होगा। उल्लेखनीय है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खाद्यान्न की सरकारी खरीद इसलिए सीमित है कि गेहूं और चावल के उत्पादन का भौगोलिक भूभाग सीमित है। ऐसे में यह उम्मीद है कि यह नई पहल सरकारी एजेंसियों की खरीद प्रक्रिया में विविधता लाएगी और देश भर के किसानों तक इसका लाभ पहुंच सकेगा। इसके साथ ही पैक्स जो कि जमीनी स्तर पर काम करने वाली सबसे छोटी सहकारी एजेंसियां हैं, वे अब तक कृषि उत्पादन के लिए अल्पकालिक ऋ ण मुहैया कराने की प्रक्रिया से जुड़ी रही हैं। यह त्रिस्तरीय सहकारी ऋण ढांचे का सबसे अंतिम सिरा है जहां वे खेती तथा उससे जुड़ी गतिविधियों में लगे समुदायों तक पहुंचती हैं। यह बात पैक्स को ग्राम पंचायत और गांवों के स्तर पर अनाज भंडारण के लिए उपयुक्त बनाती है। निश्चित तौर पर नई अनाज भंडारण योजना पैक्स को विविध काम करने वाली आर्थिक संस्था में बदल सकती है और कृषि क्षेत्र में सहकारिता की भूमिका को और अधिक मजबूत कर सकती है। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था के ग्रामीण और कृषि संबंधी परिदृश्य को बदलने में सहकारिता क्षेत्र की अहम भूमिका भी रेखांकित होती है। यह योजना खाद्यान्न की बर्बादी रोकने में भी मदद करेगी।