हिमाचल प्रदेश के एकमात्र राज्यसभा सीट के लिए हुए चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस को करारा झटका लगा है। 68 सदस्यीय राज्य विधानसभा में 43 सदस्यों के समर्थन के बावजूद कांग्रेसी उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी का पराजित होना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। भाजपा के पास केवल 25 विधायक ही हैं, किंतु वह अपने उम्मीदवार हर्ष महाजन को जिताने में सफल रही। दोनों उम्मीदवारों को 34-34 मत मिले। बाद में पर्ची के माध्यम से विजेता उम्मीदवार की घोषणा की गई जो भाजपा के पक्ष में गया। तीन निर्दलीय विधायकों के साथ-साथ कांग्रेस के 6 विधायकों ने भाजपा के समर्थन में क्रॉस वोटिंग की। कांग्रेसी एवं निर्दलीय विधायकों द्वारा भाजपा के पक्ष में मतदान किये जाने के बाद सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार पर संकट के बादल छा गए हैं। सरकार गिरने की स्थिति में थी, किंतु विधानसभा अध्यक्ष की पहल के बाद फिलहाल सरकार बच गई है। बजट पर चल रही बहस के दौरान हंगामा करने को लेकर विधानसभा अध्यक्ष ने भाजपा के 15 विधायकों को निलंबित कर दिया। इसके विरोध में भाजपा के बाकी दस विधायकों ने सदन से बहिर्गमन किया। ऐसी स्थिति में सरकार ने एकतरफा बजट पारित करवा लिया। जिससे सुक्खू सरकार बच गई है। सुक्खू सरकार पर संकट कोई नई बात नहीं है। वर्ष 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह के नाम पर चुनाव जीती थी। उस वक्त वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार माना जा रहा था। लेकिन कांग्रेस हाईकमान के हस्तक्षेप के बाद सुक्खू को मुख्यमंत्री बनाया गया। उसी वक्त से ही बगावत की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी। प्रतिभा सिंह कांग्रेस अध्यक्ष हैं। सरकार और संगठन के बीच लगातार तनातनी चल रही थी। कुछ विधायक भी सुक्खू सरकार के कामकाज से नाराज थे। कैबिनेट विस्तार के वक्त अनदेखी होने से सुधीर शर्मा एवं राजेन्द्र राणा जैसे विधायक नाराज थे। इन लोगों ने मुख्यमंत्री से मिलकर अपनी फरियाद भी सुनाई थी, किंतु मुख्यमंत्री ने इसे हल्के में लिया। सरकारी पद देने के मामले में ऐसे नेताओं को तरजीह दी गई जिन्होंने चुनाव में पार्टी प्रत्याशियों को हराने का काम किया था। तीन महीने पहले भी असंतुष्ट विधायकों एवं नेताओं की पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ बैठक हुई थी, किंतु उस पर कोई अमल नहीं हो सका। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के पुत्र विक्रमादित्य सिंह को राज्य मंत्रिमंडल में लोक निर्माण मंत्री के रूप में शामिल किया गया था। उनके साथ भी मुख्यमंत्री के संबंध अच्छे नहीं रहे। इसका परिणाम यह हुआ है कि विक्रमादित्य ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इसको लेकर सुक्खू सरकार पर संकट और बढ़ गया है। विधानसभा अध्यक्ष ने कांग्रेस के बागी छह विधायकों की सदस्यता के बारे सुनवाई की है जिस पर फैसला अभी सुरक्षित रख लिया गया है। कांग्रेस अपने बागी विधायकों को मनाने में लगी हुई है। दूसरी तरफ भाजपा सरकार पर हमलावर है। भाजपा सुक्खू सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी में है। अगर और विधायक टूट कर भाजपा खेमे में आ जाए तो सुक्खू सरकार का जाना तय है। संविधान विशेषज्ञों के अनुसार राज्यसभा में क्रॉस वोटिंग करने से विधायकों की सदस्यता नहीं जाएगी, किंतु वे कांग्रेस छोड़कर अगर भाजपा में शामिल होते हैं तो उनकी सदस्यता खतरे में पड़ सकती है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि राज्यसभा चुनाव में पार्टी का व्हीप लागू नहीं होता है। महाराष्ट्र में जून 2020 में विधान परिषद के दस सीटों के लिए हुए चुनाव के दौरान महा विकास अघाड़ी सरकार को भी क्रॉस वोटिंग के कारण जबर्दस्त धक्का लगा था। वहां भी भाजपा ने एक सीट के लिए बाजी मार ली थी। उसके बाद उद्धव ठाकरे की नेतृत्व वाली महा विकास अघाड़ी सरकार का पतन हो गया था। अब देखना है कि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस अपनी सरकार को बचाने में कामयाब रहती है या नहीं।