हर कीमत पर विकास की मंशा विनाश की लंबी यात्रा तय करती है, इसका ताजा उदाहरण उत्तराखंड, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के आस-पास का पहाड़ी क्षेत्र और असम की सुवनसिरी जल विद्युत परियोजना है, जिनके कारण सदियों से बसी मानव सभ्यता बर्वादी के कगार पर है और उपरोक्त उल्लेखित स्थानों पर फिलवक्त स्थानीय लोगों पर जो संकट के पहाड़ टूट रहे हैं, वे प्रकृृति के साथ छेड़छाड़ का नतीजा है।  हमें विकास चाहिए, परंतु किसी स्थान विशेष के पर्यावरण और जलवायु को नुकसान पहुंचाकर नहीं। वैसे भी पूरी दुनिया में इन दिनों जलवायु परिवर्तन के कारण त्राहि-त्राहि कर रही है। मौसम बदल गए हैं। गर्मी के समय में ठंड और ठंड के समय में गर्मी पड़ने का सिलसिला शुरू हो गया है, जो हमारे शरीर पर विपरीत प्रभाव डाल रहे हैं। कई तरह की बीमारियां उत्पन्न हो गई हंै, जो हमारे लिए परेशानी के सबब हैं। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ग्रेट निकोबार द्वीप में नौ अरब डॉलर के निवेश की योजना बना रही है, जिससे इस द्वीप को विशाल सैन्य और व्यापार केंद्र के रूप में बदला जा सके, लेकिन इन योजनाओं ने पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और नागरिक संस्थाओं की चिंता बढ़ा दी है। उल्लेखनीय है कि इस महापरियोजना से द्वीप की अनूठी पारिस्थितिकी बर्बाद हो सकती है। पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं के अलावा कई जानकारों को इससे द्वीप के मूल निवासियों के प्रभावित होने का डर है। जैसा कि हजारों सालों से ग्रेट निकोबार द्वीप पर रहने वाला शोम्पेन नाम का शिकारी समुदाय, जिसका बाहरी दुनिया से बेहद कम संपर्क रहा है, परंतु हिंद महासागर में चीन की बढ़ती आक्रामकता के चलते ग्रेट निकोबार को विकसित करने की योजनाओं को बल मिला है। इस द्वीप की रणनीतिक स्थिति इसे सुरक्षा और व्यापार के लिए बेहद जरूरी बना देती है। यह द्वीप भारतभूमि से करीब 1,800 किलोमीटर दूर पूर्व में स्थित है। यह इंडोनेशिया के सुमात्रा के पास है और म्यामां, थाईलैंड व मलेशिया से कुछ सौ किलोमीटर की दूरी पर है। हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस द्वीप में फिलहाल आठ हजार लोग रहते हैं। भारत सरकार ने यहां कई बड़ी परियोजनाओं के निर्माण की परिकल्पना की है, इनमें एक अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर टर्मिनल, एक हवाई अड्डा-जिसे नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सके, एक गैस, डीजल व सौर ऊर्जा पर आधारित पावर प्लांट और एक ग्रीनफील्ड टाउनशिप शामिल है।  इन विकास कार्यों से द्वीप पर रहने वालों की संख्या भी लाखों में पहुंच जाएगी। ऐसे में यह बंदरगाह द्वीप की गैलाथिया खाड़ी पर प्रभुत्व जमा लेगा। साथ ही दुनिया के सबसे व्यस्त शिपिंग रास्तों में से एक - मलक्का जलडमरू मध्य के करीब होने के चलते खूब प्रगति करेगा। सरकार की योजनाएं तेज गति से आगे बढ़ रही हैं। सरकार पिछले तीन सालों से विभिन्न अनुमोदनों, मंजूरियों और छूटों को हासिल कर रही है, परंतु आलोचकों का कहना है कि इन योजनाओं के चलते ग्रेट निकोबार के प्राचीन वर्षा वनों को स्थायी नुकसान झेलना पड़ेगा। भारत सरकार के मुताबिक इस द्वीप पर मौजूद उष्णकटिबंधीय वर्षा वन दुनिया के सबसे संरक्षित वर्षा वनों में से एक है, लेकिन इस द्वीप को रक्षा और व्यापार केंद्र में बदलने के लिए करीब साढ़े आठ लाख पेड़ काटने होंगे। पर्यावरणविदों का कहना है कि गैलाथिया खाड़ी में बड़ा बंदरगाह बनने से लेदरबैक समुद्री कछुओं की अंडे देने वाली जगहें नष्ट हो जाएंगी। इनके अलावा डॉल्फिन और दूसरी प्रजातियों को भी नुकसान होगा। खारे पानी के मगरमच्छों, केकड़ा खाने वाले बंदरों और प्रवासी पक्षियों को भी द्वीप के विकास की कीमत चुकानी होगी। बंदरगाह के निर्माण के दौरान खाड़ी के तट पर मौजूद मूंगा चट्टानें नष्ट हो सकती हैं। टाउनशिप, एयरपोर्ट और थर्मल पावर प्लांट घने जंगल वाले इलाकों में बनाए जाने हैं, जिससे जैव विविधता पर काफी प्रभाव पड़ेगा। कहा जा रहा है कि वर्तमान परिस्थिçति में शोम्पेन समुदाय पर पूरी तरह से विलुप्त होने का खतरा है। शोम्पेन एक स्थानीय जनजाति है जिसमें करीब 300 लोग हंै। अगर सरकार इस द्वीप को भारत का हांगकांग बनाने में सफल हो गई तो इस बात की कल्पना करना असंभव है कि शोम्पेन समुदाय इस विनाशकारी परिवर्तन से बच पाएगा। ऐसे में उनकी कीमत पर हांगकांग बनाने का सपना कहां तक सही है।