विपक्षी गठबंधन इंडिया लगातार कमजोर होता जा रहा है। इंडिया का नेतृत्व करने वाली प्रमुख पार्टी कांग्रेस में खुद भगदड़ मची हुई है। एक तरफ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा पर निकले हुए हैं। जहां-जहां से उनकी यात्रा गुजर रही है उस राज्य के कई नेता अपनी पार्टी छोड़कर दूसरे दलों में शामिल हो रहे हैं। आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर राहुल गांधी ने पिछले 14 जनवरी से भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू की है। यह यात्रा 15 राज्यों के 6700 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए 20 मार्च को मुंबई में समाप्त होगी। इस बार की न्याय यात्रा में कुछ बदलाव देखने को मिल रहा है। राहुल गांधी अपने परिवार की उपलब्धि की चर्चा न कर अपना ध्यान जातीय समिकरण पर केंद्रित कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में इस यात्रा के दौरान उन्होंने पिछड़े, दलित एवं आदिवासी लोगों पर लगातार फोकस किया हैं। कई जगहों पर उन्होंने जातीय जनगणना के मुद्दे को उछाला है। इसका अर्थ स्पष्ट है कि कांग्रेस इस बार जातीय समिकरण के नाव पर सवार होकर वैतरणी पार करना चाहती है, लेकिन कांग्रेस का सारा समीकरण बिगड़ता नजर आ रहा है। इंडिया गठबंधन के घटक दल लगातार कांग्रेस से दूर होते जा रहे हैं। प्रियंका गांधी के हस्तक्षेप के बाद उत्तर प्रदेश में किसी तरह समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन होना तय हुआ है। हालांकि राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच हुई वार्ता के बाद सीटों के तालमेल पर कोई सहमति नहीं बन पाई थी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले ही अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुकी है। ममता ने तो कांग्रेस को यहां तक चुनौती दे दी है कि वह अपना पिछला रिकॉर्ड 40 सीटों पर जीतने पर ध्यान केंद्रित करे। आम आदमी पार्टी पहले ही पंजाब एवं दिल्ली में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी है। आम आदमी पार्टी पंजाब की सभी 13 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जबकि दिल्ली में वह कांग्रेस के लिए केवल एक सीट छोड़ना चाहती है। आप ने स्पष्ट कह दिया है कि अगर कांग्रेस को दिल्ली की एक सीट मंजूर नहीं है तो आप वहां भी अपना उम्मीदवार उतार देगी। राहुल गांधी की न्याय यात्रा मुंबई में समाप्त हो रही है। महाराष्ट्र में भी सीटों के तालमेल को लेकर कांग्रेस, शिव सेवा (उद्धव) तथा एनसीपी (शरद पवार) के बीच पेंच फंसा हुआ है। महाराष्ट्र में भी शिव सेवा उद्धव कांग्रेस को कोई ज्यादा तरजीह देने के मूड में नहीं है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी बात यह है कि वह अपने नेताओं को ही संभाल नहीं पा रही है। अब तक कांग्रेस के 12 पूर्व मुख्यमंत्री पार्टी छोड़कर दूसरे दलों का दामन थाम चुके हैं। इसमें 9 पूर्व मुख्यमंत्री भाजपा में शामिल हुए हैं। महाराष्ट्र के ताकतवर नेता एवं पूर्व मुख्य मंत्री अशोक चव्हाण पार्टी से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो चुकी हैं। भाजपा ने चव्हाण को राज्यसभा के लिए अपना उम्मीदवार भी बनाया है। मिलिंद देवड़ा जैसे कांग्रेसी नेता पार्टी का दामन छोड़कर शिविसेना (शिंदे) पार्टी में शामिल हो गए हैं। इसके अलावा कांग्रेस का एक और नेता बाबा सिद्दिकी एनसीपी में शामिल हुआ है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को लेकर पिछले कई दिनों से जद्दोजहद चल रही है। कमलनाथ के पुत्र नकुल नाथ भाजपा में शामिल होना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता आचार्य प्रमोद कृृष्णम को पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखाया है। पंजाब के कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू भी भाजपा में शामिल होने के लिए कतार में खड़े हैं। पंजाब के सुनील जाखड़ एवं पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह पहले ही भाजपा में शामिल हो चुके हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी की कार्यशैली से नाराज हैं। उनको लगता है कि पार्टी में उनको कोई तरजीह नहीं मिल रही है। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे, आंध्र प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री किरण रेड्डी सहित कई नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। इंडिया गठबंधन के सूत्रधार नीतीश कुमार पहले ही अपना पल्ला झाड़ चुके हैं। ऐसी स्थिति में कांग्रेस को इंडिया गठबंधन को संभालने की बड़ी चुनौती है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि गठबंधन की सहयोगी पार्टियां कांग्रेस को बड़े भाई के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में अपनी प्रतिष्ठा बचाने की कठिन चुनौती होगी।