पाकिस्तान में आम चुनाव हो चुका है। इस बार इमरान खान के समर्थक भारी संख्या में चुनाव जीतने में कामयाब हुए हैं, परंतु चुनाव के बाद नवाज शरीफ और बिलावल भुट्टो की पार्टी मिलकर सरकार बनाने में जुट गई है। वैसे माना जा रहा था कि इस बार नवाज शरीफ विजेता बनकर उभरेंगे क्योंकि उन पर पाकिस्तानी सेना का हाथ है, परंतु सेना का मंसूबा सफल नहीं हो सका और इमरान के समर्थकों ने अच्छा प्रदर्शन कर सेना, नवाज और बिलावल तीनों की ङ्क्षचता बढ़ा दी है। वैसे आम सवाल कि पाकिस्तान जैसे लोकतांत्रिक देश में प्रधानमंत्री बनने के लिए आर्मी की सरपरस्ती क्यों चाहिए? पाकिस्तान में सेना इतनी शक्तिशाली आखिर कैसे हुई? इसे जानने के लिए इतिहास के कुछ पन्नों को पलटना होगा। आज तक पाकिस्तान के इतिहास में एक भी प्रधानमंत्री ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया या फिर कहिए कि उन्हें करने नहीं दिया गया। 1947 से ही पाकिस्तान एक तरह से सेना के शासन में ही रहा है या तो देश सीधा सेना के शासन में होता था या फिर सेना के अफसर ऐसा तरीका निकालते कि सरकार को उनके साथ सांठगांठ कर चलना पड़ता।
दूसरी ओर पाकिस्तान की सेना का मानना है कि वो पाकिस्तान के अस्तित्व का केंद्र है। बंटवारे के बाद पाकिस्तान में दूरदर्शी नेताओं की कमी खलने लगी। मोहम्मद अली जिन्ना के देहांत के बाद देश सेना के हवाले हो गया। बंटवारे के बाद जो एक चीज उन्हें अंग्रेजों से विरासत में मिली वो थी एक अनुशासित सेना। 1951 तक ब्रिटिश जनरल पाकिस्तान की सेना का नेतृत्व करते रहे। इसके बाद सेना की कमान जनरल अयूब खान को सौंप दी गई थी। जानकारों का कहना है कि एक तरफ पाकिस्तान का संविधान लिखने में देरी हो रही थी, वहीं सेना अपनी पकड़ देश में मजबूत करती जा रही थी। सिविल मिलिट्री नौकरशाही सेना के दबदबे की खास वजह रही है। चूंकि पाकिस्तान लंबे-लंबे अरसे तक सीधा सेना के अधीन रहा है, इस वजह से भी वहां लोकतंत्र कभी पनप नहीं पाया। पाकिस्तान में जनरल जिया-उल-हक के शासन में धार्मिक उग्रवाद भी बढऩे लगा। इसके चलते पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में भी स्ट्रेटजिक डेप्थ पॉलिसी के नाम पर हस्तक्षेप चालू कर दिया। अफगानिस्तान की अस्थिरता को भी पाकिस्तान ने अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश की। 11 सितंबर के हमले के बाद जब अमरीका ने अफगानिस्तान पर हमला किया तब पाकिस्तान ने इसमें बड़ी मदद की। जाहिर है कि इस मदद के बदले सेना को बड़ा लाभ भी हासिल हुआ। जनरल परवेज मुशर्रफ के शासन में पूर्व प्रधानमंत्री, बेनजीर भुट्टो की भी हत्या हुई।
उस दौर में पाकिस्तान का आंतरिक खतरा कहे जाने वाला बलूचिस्तान मसला भी उफान पर था। पाकिस्तान की सेना भारत को भी एक बड़े खतरे के रूप में पेश करती है। पाकिस्तानी सेना लगातार देश पर खतरों का हवाला देकर अपने लिए सहानुभूति और समर्थन जुटाने की कोशिश करती है। आर्थिक मोर्चे पर परेशान देश के लोगों को सेना के अलावा और कोई मददगार नजर नहीं आता, जबकि आमतौर पर सेनाओं का काम होता है देश की रक्षा करना। मगर बाकी देशों से विपरीत, पाकिस्तान की सेना ने कई गैर-सैन्य क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश किए हैं। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में पाकिस्तान सेना एक मल्टीनेशनल कंपनी की तरह काम करने लगी है। उनके कई बड़े अफसरों ने रियल एस्टेट, फैक्ट्री, फर्टिलाइजर और बड़ी फूड-चेन जैसे उद्योगों में या तो निवेश किया है या फिर वो संस्थान पूरी तरीके से उनके संचालन में काम कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि 2011 से 2015 के बीच पाकिस्तान की सेना की संपत्ति में 78 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2016 तक पाकिस्तान में सशस्त्र बलों ने 50 से अधिक वाणिज्यिक संस्थाओं को चलाया,जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र के संगठन और 30 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर के रियल एस्टेट उद्योग शामिल थी।
उनकी व्यावसायिक संपत्ति का मूल्य 40 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर से अधिक है। पूर्व सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा और सेना के प्रवक्ता जनरल असीम सलीम बाजवा समेत शीर्ष सैन्य अधिकारियों पर बड़े आर्थिक लाभ उठाने के आरोप लगते आए हैं। बाजवा परिवार छह साल के भीतर ही देश के अरबपतियों में शामिल हो गया। मंदी झेल रहे पाकिस्तान में सेना के परिवारों और अफसरों के लिए कोई मंदी नहीं आती। जनरल असीम सलीम बाजवा और उनके भाई ने एक बड़ा कारोबार खड़ा किया है। इसमें चार देशों में कुल 133 रेस्तरां शामिल थे। कभी-कभार ऐसा लगा जैसे कि सभी नेता मिलकर सेना की मुखालफत करेंगे, मगर यह भी विफल रहा। नेता भी भ्रष्ट थे तो सेना ने जिसके सर पर अपना हाथ रख दिया, वही प्रधानमंत्री हुआ। नेता भी अपने विपक्ष को कमजोर करने के लिए सेना की मदद लेते हैं।
2019 में सेना ने ही इमरान खान को चुनावी मैदान में उतारा था। उस वक्त माना जा रहा था कि इमरान और सेना साथ मिलकर काम करेंगे। भारत-पाकिस्तान में क्रिकेट-प्रेम को देखते हुए कयास लगाए जा रहे थे कि अब पूर्व क्रिकेटर खान दोनों देशों के रिश्तों को बेहतर करेंगे। हालांकि ऐसा हुआ नहीं बल्कि रिश्ते और खराब ही हुए। पाकिस्तान की सेना अब फिर 4 साल पहले निर्वासित किए गए नवाज शरीफ को वापस लाई है। पाकिस्तान में सेना इसलिए भी सबसे ऊपर है क्योंकि वह नागरिकों को हमेशा भुलावे में रखती है।