लोकसभा चुनाव से महज दो-तीन महीने पहले नीतीश कुमार का एनडीए के साथ जाना राजग गठबंधन के लिए कितना फायदेमंद रहेगा, यह तो आने वाला वक्त बताएगा, परंतु मोदी और शाह इस बात से संतुष्ट हैं कि उन्होंने अपने रास्ते से प्रधानमंत्री पद के एक दावेदार को हटा दिया। फिर भी भाजपा और जदयू को कतई नहीं भूलना चाहिए कि फिलहाल बिहार में वो स्थिति नहीं है, जो 2019 में थी। जातीय गणना, ओबीसी, ईबीसी और एससी और एसटी के लिए आरक्षण का कोटा बढ़ाने और लाखों लोगों को नौकरी मिलने का फायदा नीतीश को कम और तेजस्वी को ज्यादा मिलने वाला है। कारण कि बिहारवासियों के मन में यह बात घर कर गई है कि बिहार में जो सुधार और नौकरियों की बहार आई है, वह तेजस्वी के कारण आई है, पिछले डेढ़ साल में जो भी हुआ है, वह तेजस्वी के चुनावी वादों के अनुकूल है। कारण कि नीतीश कुमार ने पहले कहा था कि दस लाख लोगों को नौकरी देकर तनख्वाह देने के लिए पैसा कहां से लाएंगे, परंतु जब बिहार में महागठबंधन की सरकार बनी तो यह संभव हो सका, इस बात को बिहारवासी पूरी तरह से मान बैठे हैं। परंतु इंडिया गठबंधन को मान लेना चाहिए कि उनके उद्देश्य की पूर्ति पप्पू यादव और मुकेश सहनी को साथ में लेने से ही हो पाएगा। पप्पू यादव पूर्णिया, सुपौल और मधेपुरा में इंडिया गठबंधन को जिताने में महती भूमिका निभा सकते हैं तो मुजफ्फरपुर में मुकेश सहनी को छोड़कर भाजपा को कोई भी हरा नहीं सकता है। यदि इंडिया गठबंधन ओबैसी के प्रभाव को कम करने में सफल हो जाता है तो यह गठबंधन दरभंगा, कटिहार, मधुबनी, झंझारपुर, किशनगंज, अररिया, सीतामढ़ी, वैशाली और समस्तीपुर में भी अच्छा प्रदर्शन कर सकता है। यदि आनंद मोहन इंडिया गठबंधन के साथ रहते हैं तो पार्टी शिवहर, महराजगंज, छपरा, वैशाली और औरंगाबाद में बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। जानकार तो यहां तक कहते हैं कि लोकसभा चुनाव के पहले नीतीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच तीसरी बार गठबंधन हुआ है, लेकिन लगता नहीं कि इससे बिहार की तकदीर में कोई बदलाव आएगा। एक बार फिर भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के साथ समझौता करके उन्होंने नौवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके राजग और लालू प्रसाद के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के बीच निष्ठा बदलने की इस प्रक्रिया में शासन बहुत पहले ही पीछे छूट चुका था। राज्य के राजनीतिक मामलों की बात करें तो नीतीश के जनता दल (यूनाइटेड) के पास राज्य विधानसभा में 45 सीट हैं। परंतु 243 विधानसभा सीट वाले प्रदेश में 78 सीट वाली भाजपा और 79 सीट वाले राजग दोनों प्रभावशाली स्थिति में हैं। बिहार में 2025 में विधानसभा चुनाव होंगे, लेकिन नीतीश के दोबारा राजग में जाने में सबसे अहम बात यह है कि यह कांग्रेसनीत इंडियन नेशनल डेवलपमेंट इन्क्लूसिव अलायंस (इंडिया) की चुनावी संभावनाओं के लिए बड़ा झटका है। फिलहाल महागठबंधन बिहार में पहले की अपेक्षा बेहतर स्थिति में है। वैसे नीतीश को इस गठबंधन के प्रमुख शिल्पकारों में शामिल माना जा रहा था। अब उनके गठबंधन से अलग होने और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा दो ऐसे झटके हैं जिनसे निपटने में ‘इंडिया’ को काफी संघर्ष करना होगा। रोचक बात यह है कि नीतीश और ममता दोनों ने यह शिकायत की थी कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने देश के पूर्वी से पश्चिमी हिस्से की ओर भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू करने के पहले उनसे मशविरा नहीं किया और उनके राज्यों से यात्रा निकलने देने के लिए अनुमति नहीं मांगी। विचार यह था कि यात्रा को ‘इंडिया’ गठबंधन के बैनर तले आयोजित किया जाना चाहिए था, परंतु अंदर की बात यह है कि दोनों ही राजनेता आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को जीतने लायक साझेदार नहीं मानते। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि नीतीश के राजग में आने से राजग थोड़ा बहुत मजबूत हुआ है, परंतु इस बार नीतीश गेम चेंजर की भूमिका में नहीं हैं।
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