नेपाल भारत का पड़ोसी देश है। दोनों के बीच दिल का रिश्ता है। दोनों देशों के लोग एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। नेपाल भले ही विदेशी राष्ट्र है, परंतु दोनों देशों के बीच गजब की सांस्कृृतिक और धाॢमक समानता है। दूसरी ओर दोनों के बीच प्राचीन काल से ही बेटी और रोटी का भी रिश्ता है। ऐसे में व्यापारिक रिश्ता भी होना स्वाभाविक है। इसी बीच संधि के तहत नेपाल अगले 10 सालों में भारत को 10,000 मेगावाट पनबिजली देगा। नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अमृत बहादुर राय ने इस लंबी-अवधि की ऊर्जा व्यापार संधि पर हस्ताक्षर किए जाने की पुष्टि की। संधि के बार में और ज्यादा जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन नेपाल के स्वतंत्र ऊर्जा उत्पादकों के संघ के अध्यक्ष गणेश कार्की ने बताया कि संधि ऐतिहासिक है। अब सरकार को इस स्तर पर उत्पादन को समर्थन देने के लिए कानून और अनुकूल माहौल बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। जानकारों को उम्मीद है कि संधि की वजह से नेपाल के पनबिजली क्षेत्र में और निवेश आएगा।

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक साल 2000 में पांच में चार से भी ज्यादा नेपाली लोगों के पास बिजली नहीं थी, लेकिन उसके बाद से कई बांधों के बनाए जाने की वजह से देश की तीन करोड़ आबादी में लगभग सबके पास बिजली की सप्लाई पहुंच गई है। इस समय देश में 150 से ज्यादा बिजली परियोजनाएं चल रही हैं, जिनकी बदौलत देश की इंस्टॉल्ड कैपेसिटी 2,600 मेगावाट से ज्यादा हो गई है। 200 से ज्यादा अतिरिक्त परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। पानी के मामले में नेपाल एक धनी देश है। उसके पास पहाड़ी नदियों की एक ऐसी प्रणाली है जो उसे ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में एक पावरहाउस बना सकती है। कुछ अध्ययनों में अनुमान लगाया गया है कि देश की संभावित क्षमता 72,000 मेगावाट की है - यानी मौजूदा इंस्टॉल्ड कैपेसिटी से 25 गुना ज्यादा है। भारत को नेपाल 2021 के आखिरी महीनों से ही छोटे स्तर पर बिजली निर्यात कर रहा है।

भारत और नेपाल के दूसरे शक्तिशाली पड़ोसी देश चीन के बीच लंबे समय से नेपाल के पनबिजली क्षेत्र में प्रभुत्व और निवेश के मौकों को लेकर प्रतिस्पर्धा रही है। अभी तक भारत नेपाल का पसंदीदा साझेदार रहा है, जिसके पीछे एक कारण यह भी है कि भारत ने जोर देकर कहा है कि वह ऐसी परियोजनाओं से ऊर्जा नहीं लेगा जिनमें किसी तीसरे देश का पैसा लगा हो। भारत बिजली बनाने के लिए भारी रूप से कोयले पर निर्भर है, लेकिन उसने 2060 तक नेट शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने का वचन दिया है। कुछ विशेषज्ञों ने नेपाल की पनबिजली की क्षमता बढ़ाने की और तेजी से बढ़ते कदमों की आलोचना भी की है। उनका कहना है कि कभी कभी निर्माण के दौरान पर्यावरणीय अनुपालन के कदमों की अनदेखी हो जाती है। पिछले साल केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक प्रस्ताव का ड्राफ्ट सामने आया था जिसमें संरक्षित प्राकृृतिक अभयारण्यों में बांध बनाने की प्रक्रिया को आसान करने का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन इस प्रस्ताव को लेकर पर्यावरणविदों ने चेतावनी जाहिर की थी। देश में बाढ़ और भूस्खलन भी आम हैं जिनकी वजह से पनबिजली परियोजनाओं को जोखिम का सामना करना पड़ता है। जलवायु परिवर्तन की वजह से बाढ़ और भूस्खलन दोनों ही बार-बार आ रहे हैं और उनकी तीव्रता भी बढ़ती जा रही है। बावजूद इसके दोनों देशों के बीच समझौता हुआ है, जो ऊर्जा की जरूरत को रेखांकित करता है। आज भारत को ऊर्जा की काफी जरूरत है, उन जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न प्रकार के ऊर्जा स्रोतों  का उपयोग किया जा रहा है, जिनमें हरित ऊर्जा विशेष रूप से उल्लेखनीय है।