गुवाहाटी : असम में अल्फा उग्रवाद की 44 साल लंबी यात्रा में शुक्रवार को नई दिल्ली में संगठन के वार्ता समर्थक गुट के साथ त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर एक महत्वपूर्ण अध्याय है। असम में हाल के समय में लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाले कई महत्वपूर्ण कदम देखे गए हैं, लेकिन अल्फा मुद्दा कई विवादास्पद मुद्दों के बीच शीर्ष पर बना रहा। अल्फा मुद्दा शुरू में एक आंदोलन था, लेकिन जल्द ही अपहरण, जबरन वसूली, हत्याओं और बम विस्फोटों के साथ यह सशस्त्र संघर्ष में बदल गया। समझौते पर हस्ताक्षर को चार दशक पुरानी समस्या का अधूरा समाधान माना जा रहा है, क्योंकि परेश बरुवा नीत अल्फा (इंडिपेंडेंट) गुट तब तक बातचीत के लिए तैयार नहीं है जब तक कि असम की संप्रभुता के मुद्दे पर चर्चा नहीं होती। उसके कैडर हिंसा की छिटपुट घटनाओं में शामिल हैं और सुरक्षा बलों ने अभियान तेज कर दिया है। अल्फा (आई) की अनुपस्थिति और विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों द्वारा इसे अधूरा समाधान बताए जाने के बावजूद, यह समझौता एक मील का पत्थर है, क्योंकि 1991 के बाद से संगठन के साथ बातचीत के कई प्रयासों के बावजूद, कोई समाधान नहीं निकला है।
ऊपरी असम जिलों के 20 युवाओं के एक समूह द्वारा सात अप्रैल, 1979 को शिवसागर के ऐतिहासिक अहोम-कालीन ‘एम्फीथिएटर’ रंग घर में गठित अल्फा ने कई मौकों पर बातचीत की इच्छा जताई, लेकिन संप्रभुता मुद्दे पर अपने रुख पर अड़ा रहा। वर्ष 2011 में संगठन में दूसरी बार विभाजन होने के बाद अध्यक्ष अरविंद राजखोवा सहित शीर्ष नेतृत्व पड़ोसी देश से असम लौटा। उसके बाद वे संप्रभुता विषय के बिना बातचीत की मेज पर आने के लिए सहमत हुए और केंद्र सरकार को 12-सूत्रीय मांग पत्र प्रस्तुत किया। उससे पहले 1992 में नेताओं और कैडरों के एक वर्ग द्वारा बातचीत की इच्छा जताए जाने के बाद संगठन विभाजित हो गया था, लेकिन राजखोवा और बरुवा दोनों तब संप्रभुता मुद्दे पर दृढ़ थे। बातचीत की इच्छा रखने वालों ने सरकार के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और खुद को आत्मसमर्पित अल्फा या सल्फा के रूप में संगठित किया। 1990 और 2000 के दशक में राज्य में उनका जबरदस्त प्रभाव था और कांग्रेस तथा उसके बाद की अगप सरकारों ने उन्हें अल्फा के खिलाफ इस्तेमाल किया। आरोप है कि अगप सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान अल्फा नेताओं के परिवारों के सदस्यों की हत्याओं में सल्फा सदस्यों का इस्तेमाल किया था।
अल्फा शुरू में पड़ोसी नगालैंड और मिजोरम के उग्रवाद से प्रभावित था और उसने अपने शुरुआती दिनों में ग्रामीण लोगों के बीच लोकप्रियता हासिल की। उसने ग्रामीण शिक्षित बेरोजगार युवाओं को विशेष तौर पर आकर्षित किया था। कहा जाता है कि यह संगठन 1985 की पहली असम गण परिषद (अगप) सरकार के दौरान काफी प्रभावशाली था, लेकिन राज्य सरकार और जनता दोनों के साथ संबंध धीरे-धीरे खराब होते गए, क्योंकि अल्फा द्वारा अपहरण, जबरन वसूली और हत्याएं किए जाने के कारण राज्य में उथल-पुथल मच गई। नवंबर 1990 में राज्य की स्थिति एक निर्णायक मोड़ पर आ गई। बाद में 28 नवंबर, 1990 को सेना ने अल्फा के खिलाफ ऑपरेशन बजरंग शुरू किया और अगले दिन, प्रफुल्ल महंत नीत अगप सरकार को बर्खास्त करने के साथ ही राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। ऑपरेशन बजरंग की शुरुआत के साथ 1,221 उग्रवादियों की गिरफ्तारी हुई, असम को अशांत क्षेत्र घोषित किया गया और सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) कानून लागम किया। इसके साथ ही अल्फा को अलगाववादी और गैरकानूनी संगठन घोषित कर दिया गया, जो अब तक कायम है।