धर्म, संस्कृति, आध्यात्मिक मान्यताओं एवं परम्पराओं के पीछे वैज्ञानिक प्रमाण छुपे हैं। पुराने जमाने में लोग इन परंपराओं के वैज्ञानिक आधार को भली-भांति जानते-समझते थे, अतः इनका अनुसरण कर वेदीघ्र जीवन, समृद्धि एवं खुशहाली प्राप्त करते थे। संत-महात्मा एवं गुरुजनों के शिष्य न केवल उनके पैर छूके, दंडवत आदि करके प्रणाम करते थे बल्कि उनके पैरों को धोकरचरणामृत लेते थे।भारतीय संस्कृति में सिद्ध योगियों के चरणों की रज एवं चरणामृत को महत्वपूर्ण माना है। वर्तमान समय में लोग दूर से ही नमस्कार करते हैं, बड़े-बुजुर्गों का पैर छूकर आर्शीवाद लेने में अधिकांश व्यक्ति कतराते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी का पैर छूता है, तो उसके शरीर से स्रावित हो रही ऊर्जा को वह ग्रहण कर लेता है जिससे पैर छूने वाले का कल्याण स्वतः हो जाता है चाहे सामने वाला व्यक्ति मन में कैसी भी भावना रखे। इसी प्रकार अगर आर्शीवाद देने वाला व्यक्ति पैर छूने वाले के सिर पर हाथ रख दे, तो ऊर्जा का प्रवाह और तीव्रता से पैर छूने वाले के शरीर में प्रवेश कर उसका कल्याण करता है।

पांव के अंगूठे से जो ऊर्जा निकलती है वह सीधे मस्तिष्क को स्पर्श करते हुए कल्याण करती है। साष्टांग दंडवत करने से आज्ञा चक्र, मणिपुर चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र सक्रिय होते हैं। सद्विचार रखकर चरण स्पर्श करने से हमारे सद्विचार ऊर्जा में बदलकर अपनी हथेलियों द्वारा शरीर के सहस्त्रार चक्र तक पहुंचते हैं। यह ऊर्जा आज्ञा चक्र से होते हुए पूरे शरीर में फैल जाती है जिससे प्राण शक्ति की वृद्धि एवं चित्त एकाग्र होता है।

चरण स्पर्शकरने पर मनो वैज्ञानिक रूप से हमारे अंदर के अहंकार का पतन हो जाता है और जिस व्यक्ति का पैर स्पर्श करते हैं, उसी पुरुष की तपस्या का अंश हमारे अंदर आने लगताहै। पूर्ण आशीर्वाद द्वारा जीवन में सुख-शांति प्राप्त करने के लिए हृदय रूपी बर्तन को पूरी तरह से खाली करना पड़ता है, हृदय में श्रद्धा-विश्वास की जगह बनानी पड़ती है। आधा झुकने पर आधा ही लाभ प्राप्त होता है। अतः आशीर्वाद पूर्ण रूप से ग्रहण करने के लिए साष्टांग प्रणाम अवश्य करना चाहिए। इसी प्रकार जब हम हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं, तो हमारी हथेली के नाड़ी मंडल एवं अंगुलियों के छोर पर उठने वाली तरंगें तुरन्त दिमाग पर असर करती हैं और मन शांत होता है। बड़ों का सम्मान, आयु, यश, बल औरज्ञान के रूप में सुख और लाभ देता है।