ग्वालियर की आर्दश गोशाला में लगाए गए पौधों ने महज 2 साल में एक सघन वन का रूप ले लिया है। इतना ही नहीं, ये पौधे अन्य पौधों की तुलना में अधिक ऑक्सीजन भी उत्पादित करते हैं। गोशाला के संचालन मंडल के संत ऋषभ महाराज ने बताया कि ये पौधे जापानी तकनीक मियावाकी से लगाए गए हैं, जिनसे कई लाभ होते हैं। तो आइए जानते हैं कि क्या है मियावाकी तकनीक और इसके क्या लाभ हैं। संत ऋषभ महाराज ने बताया कि मियावाकी तकनीक से पौधे लगाने पर वे जल्द ही एक वन का रूप ले लेते हैं। उन्होंने बताया कि इस तकनीक के अनुसार जहां पौधरोपण किया जाना है वहां पहले लगभग 3 फीट तक खुदाई की जाती है। इसके बाद उसमें प्राकृतिक खाद्य पदार्थ (गोबर की खाद) की एक मोटी परत बिछाई जाती है। इसके बाद एक-एक मीटर की दूरी पर 3 से 4 पौधे लगाए जाते हैं। इन पौधों में एक ज्यादा बढ़ने वाला पौधा और अंत में कम लंबाईवाले पौधों को क्रमानुसार लगाना चाहिए।
आप देखेंगे कुछ ही वर्षों में इनसे घना वन तैयार हो जाएगा। यह वन इलाके के लिए एक तरह के आक्सीजन बैंक का भी काम करेगा। बताया जाता है कि वर्तमान में जहां गोशाला स्थापित है, वहां कभी चमड़े की फैक्ट्री हुआ करती थी। कई प्रकार के रसायनों के प्रयोग से इस स्थान की भूमि बंजर हो चुकी थी। लेकिन गोशाला का संचालन कर रहे संत समुदाय और गोसेवकों ने अपनी मेहनत से इस बंजर भूमि को उपजाऊ बना दिया। यहां की लगभग एक बीघा जमीन पर 5 हजार से अधिक पौधे लगाए। ये पौधे आज एक सघन वन का रूप ले चुके हैं।
पर्यावरण में होगा सुधार : संत ऋषभ ने बताया कि अगर इस तरह से हम अपने आसपास पौधरोपण करते हैं तो इससे प्रदूषण तो कम होगा ही, पर्यावरण में भी सुधार होगा। क्योंकि इस प्रणाली से पौधरोपण करने से आसपास के क्षेत्र का जलसंग्रहण भी बढ़ता है। साथ ही पौधों की अधिकता से क्षेत्र का आक्सीजन लेवल भी बढ़ता है। वहीं जब आपके लगाए हुए पौधे पेड़ का रूप लेते हैं तो उन पर पक्षियों का बसेरा भी बढऩे लगता है। चिड़ियों का कलरव मनोरम संगीत से कम नहीं होता।