आमतौर देखा जाता है कि जब विश्व के किसी देश के साथ अमरीका और उसके सहयोगी यूरोपीय यूनियन के देशों के साथ विचार नहीं मिलते तो वे आॢथक पाबंदी लगाने की धमकी देते हैं और पाबंदी लगाने में जरा भी देरी नहीं करते, परंतु सच्चाई यह है कि उनकी आॢथक पाबंदियों का संबंधित देश पर कोई खास असर नहीं पड़ता और वहां के शासनाध्यक्ष आराम से अपने देश को संचालित करने में सफल रहते हैं। रूस और ईरान इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं और ये पांबदी के बावजूद बिना किसी टेंशन  के अपने देश को उन्नति के पथ पर ले जा रहे हैं और उन पर अमरीकी दबाव का कोई असर नहीं पड़ रहा। फिलहाल प्रतीक हो रहा है कि यूक्रेन पर रूस के आक्रमण को सफलता मिल रही है। ऐसा इसलिए कि यूक्रेन की 2022 में रूस के हाथों गंवाई गई भूमि दोबारा हासिल करने की उम्मीदें अब धीरे- धीरे समाप्त हो गई हैं। वैसे कहा जा सकता है कि इस लड़ाई में यदि अमरीका और यूरोपीय संघ की एंट्री नहीं होती तो यह यद्ध इतना लंबा नहीं खींचता।

दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि इस लड़ाई को भड़काने में अमरीका और उसके पिछलग्गू यूरोपीय संघ के देशों की अहम भूमिका है। सच्चाई तो यह है कि रूस और यूक्रेन दोनों नहीं चाहते कि अब लड़ाई आगे बढ़े, परंतु यूक्रेन सहयोगी इसको रोकने में बाधक बने हुए हैं। जानकार बताते हैं कि अब भी रूस कुछ और इलाकों पर कब्जा कर सकता है। ऐसे में यूक्रेन का आर्थिक पुनर्गठन एक बड़ी चुनौती बना रहेगा। उसे बहुत बड़े पैमाने पर विदेशी मदद की आवश्यकता होगी जो शायद जरूरत के मुताबिक मिले या न भी मिले। वहीं रूस को वित्तीय और व्यापार प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था ने पश्चिम के उन अनुमानों को धता बता दिया है, जिनमें माना जा रहा था कि उसका तेजी से पतन होगा। यकीनन नुकसान हुआ है, लेकिन उसे थाम लिया गया है। वर्ष 2022 में उसकी अर्थव्यवस्था में 2.1 फीसदी की गिरावट आई और उसके बाद अब उम्मीद है कि 2023 में वह 2.8 फीसदी बढ़ेगी। ताजा तिमाही में 5.5 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है।

व्यापार प्रतिबंधों के बावजूद चालू खाता भारी अधिशेष की स्थिति में है। सैन्य व्यय में काफी इजाफा हुआ है और माना जा रहा है कि 2024 में यह दोगुना होकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के छह फीसदी के बराबर होने की उम्मीद है, इसका अर्थ है बजट 2.8 फीसदी घाटे में है, परंतु इसमें कोई समस्या नहीं है, क्योंकि सार्वजनिक व्यय जीडीपी के बमुश्किल 20 फीसदी के स्तर पर है। नि:संदेह जंग न होती तो ये संकेतक शायद अधिक बेहतर होते। इसकी बड़ी मानवीय कीमत भी चुकानी पड़ी है, परंतु आर्थिक आंकड़ा पश्चिम के अनुमान के मुताबिक नहीं हैं। फरवरी 2022 में प्रतिबंध लगाने की शुरुआत हुई थी। उस वक्त तमाम तरह की बातें की जा रही थीं कि रूस की किलेबंदी हो जाएगी, अर्थव्यवस्था ढह जाएगी। यह भी कहा जा रहा था कि व्लादीमिर पुतिन गंभीर रूप से बीमार हैं। बहरहाल, पुतिन और रूस दोनों ठीक हैं और जंग जारी है। अगर इन प्रतिबंधों का कोई बड़ा असर नहीं हुआ तो वह इसलिए कि रूस को चीन और भारत के रूप में अपने तेल के लिए ग्राहक मिल गए।

हाल के महीनों में वह 60 डॉलर प्रति बैरल की पश्चिम द्वारा थोपी गई सीमा भी तोडऩे में कामयाब रहा। जिंस कीमतों में तेजी ने निर्यात को अतिरिक्त उछाल प्रदान की है जबकि आयात को तुर्की, लिथुआनिया, मध्य एशिया, ईरान और चीन के रास्ते पूरा किया जा रहा है। आम रूसी नागरिक कहते हैं कि प्रतिबंधों ने उन्हें ज्यादा प्रभावित नहीं किया। ऐसा इसलिए कि अधिकांश प्रतिबंध रोजमर्रा की वस्तुओं पर लागू नहीं होते। ऐसे में युद्ध का समर्थन बरकरार है। दीर्घावधि में रूस को कीमत चुकानी होगी। उसकी प्राकृतिक गैस को वैकल्पिक बाजारों की आवश्यकता है। चूंकि चीन एकमात्र वास्तविक उम्मीदवार है।  पश्चिमी तकनीक तक पहुंच की कमी का असर समय के साथ नजर आएगा। निजी क्षेत्र की गतिविधियों की कमी अर्थव्यवस्था को सरकार पर अधिक निर्भर बनाएगी। इसका असर उसकी किफायत क्षमता पर पड़ेगा। ईरान का अनुभव सबक लेने वाला है। वह दशकों से पश्चिमी प्रतिबंध झेल रहा है, लेकिन दीर्घावधि में तीन फीसदी से अधिक की वृद्धि दर हासिल करने में कामयाब रहा है। यह दर बहुत अधिक नहीं है, लेकिन फिर भी यह देश के लिए उपयोगी तो रही ही है। इसलिए पूरी दुनिया को अमरीका और ईयू के प्रतिबंधों से ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है।