राजनीति में टाइमिंग काफी महत्वपूर्ण है। हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन काफी लचर रहा तो दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने इन चुनावों में टाइमिंग का सही ढ़ंग से सदुपयोग नहीं किया और ङ्क्षहदी हार्ट लाइन के राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव हार गई,जबकि वह पहले से राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सत्ता पर काबिज थी और इस बार वह राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव जीतने का दावा करते हुए मध्यप्रदेश को भी भाजपा से छीनने की तैयारी में थी, परंतु जो रिजल्ट आया, वह कांग्रेस के लिए काफी दुखद और निराश करने वाला था। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि इन राज्यों में मिली हार के बाद इंडिया गठबंधन (इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस) में क्षेत्रीय पार्टियों के आगे कांग्रेस असहज स्थिति में है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने तो साफ कहा कि कांग्रेस ने गठबंधन में चुनाव लड़ा होता तो शायद चुनाव परिणाम कुछ और होता।
जदयू ने भी कहा है कि अकेले चुनाव लड़कर कांग्रेस ने गलती की। हार के लिए सिर्फ वही जिम्मेदार है। कांग्रेस की चुनावी हार का असर छह दिसंबर को नई दिल्ली में प्रस्तावित गठबंधन की बैठक पर भी दिखा। बैठक को लेकर क्षेत्रीय दल बहुत उत्साहित नहीं दिखे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पारिवारिक आयोजन के कारण तो झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने पहले से तय कार्यक्रम में व्यस्त होने की वजह से बैठक में ना आने की बात कही। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने भी राज्य में आए चक्रवाती तूफान के कारण बैठक में शामिल होने पर असमर्थता जताई,वहीं मध्य प्रदेश के चुनाव में समाजवादी पार्टी की अनदेखी से नाराज अखिलेश यादव ने भी व्यस्तता का हवाला देते हुए बैठक में नहीं आने की बात कही। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अस्वस्थता की वजह से आने से इनकार कर दिया। इस बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आखिरी समय में प्रस्तावित बैठक स्थगित कर दिया।
अब यह बैठक दिसंबर के तीसरे हफ्ते में 17 तारीख को हो सकती है। छह दिसंबर को खडग़े के आवास पर गठबंधन के शीर्ष नेताओं की जगह समन्वय समिति की बैठक बुलाई गई। वैसे कहा तो जा रहा है कि इन प्रमुख नेताओं के नहीं आने की वजह से यह बैठक टाल दी गई, किंतु जानकार इसे कांग्रेस पर क्षेत्रीय दलों के दबाव की राजनीति बता रहे हैं। कांग्रेस भले ही अपनी हार से दुखी हो, किंतु गठबंधन के घटक दल इसमें अपना फायदा देख रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि कांग्रेस अब धरातल पर उतरकर बात करेगी। इस वजह से 2024 के लोकसभा चुनाव में सीटें साझा करने के मुद्दे पर कोई परेशानी नहीं होगी। जानकार बताते हैं कि घटक दलों को चिंता थी कि अगर कांग्रेस ने जीत दर्ज की होती तो वह सीटों के बंटवारे में निश्चित ही अपनी मनमर्जी करती। ऐसे में अब उसकी हार से घटक दलों का मनोबल बढ़ता नजर आ रहा है। टीएमसी ने अपने मुखपत्र में साफ लिखा है कि कांग्रेस की इस हार का असर पूरे देश में दिख सकता है।
विपक्ष को इससे पूरे देश में नुकसान होगा, वहीं केरल के मुख्ययमंत्री पी. विजयन ने भी कांग्रेस की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि लालच और सत्ता की लालसा के कारण हिंदी भाषी राज्यों में उसकी हार हुई। विजयन का कहना है कि कांग्रेस ने सोचा, वह अपने दम पर बीजेपी से जीत सकती है। इसलिए उसने इन चुनावी राज्यों में इंडिया गठबंधन के अन्य दलों के साथ हाथ नहीं मिलाया। उन्होंने कहा है कि कांग्रेस को यह तय करना होगा कि वह हमसे लडऩा चाहती है या बीजेपी से। अगर उसे बीजेपी से लडऩा है, तो राहुल गांधी को वायनाड से चुनाव नहीं लडऩे के बारे में सोचना चाहिए। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वर्तमान समय में विपक्षी पार्टियों के लिए एकजुट रहना जरूरी है। यह समय एक- दूसरे सहयोगी की गलती निकालने और उसे सार्वजनिक करने का नहीं है।
विधानसभा चुनावों में जो गलतियां हुई,उन्हें लोकसभा में न दोहराया जाए, इस पर काम करने की जरूरत है तभी वे एनडीए जैसे मजबूत गठबंधन के सामने खड़े हो पाएं, क्योंकि लडऩे से पहले खड़े होने की सलाहियत जरूरी है, कारण कि फिलहाल विपक्ष खड़े होने की स्थिति में नहीं है तो वह भाजपा गठबंधन से क्या खाक मुकाबला करेगा, इसलिए इंडिया अलायंस से घटक दलों को आपसी दांव- पेंच छोड़कर ईमानदारी से एनडीए का मुकाबला करने की जरूरत है तभी उन्हें जीत की राह दिखेगी और सरकार भी बन सकती है, परंतु इसके लिए आतंरिक ईमानदारी की जरूरत है।