भारतीय सनातन धर्म में देवी-देवताओं की आराधना के साथ व्रत-उपवास रखने की परंपरा अनादि काल से चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि भक्तिभाव के साथ की गई आराधना से सुख-समृद्धि, खुशहाली का मार्ग प्रशस्त होता है, साथ ही मनोकामना की पूर्ति का सुयोग बनता है। माह-तिथि विशेष के संयोग से ही पर्व मनाया जाता है। कार्तिक शुक्लपक्ष का प्रमुख पर्व वैकुण्ठ चतुर्दशी की विशेष महिमा है। वर्ष में दो बार चतुर्दशी तिथि के दिन पर्व मनाया जाता है। प्रथम-भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्दशी जिसे 'अनन्त चतुर्दशी' कहते हैं तथा द्वितीय-कार्तिक शुक्लपक्ष की चतुर्दशी, जिसे 'वैकुण्ठ चतुर्दशी' के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान् श्रीविष्णु तथा भगवान शिव की हर्ष-उमंग व उल्ïलास के साथ विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। निशिथ व्यापिनी चतुर्दशी तिथि पर यह पर्व 25 नवंबर, शनिवार को मनाया जाएगा, जबकि उदया तिथि पर मनाने वाला पर्व 26 नवंबर, रविवार को मनाया जाएगा। ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा-अर्चना के पूर्व देवाधिदेव महादेव की पूजा-अर्चना की जाती है। आज के दिन भगवान शिवजी को तुलसी तथा भगवान श्रीहरि विष्णुजी को बेलपत्र चढ़ाने का भी विधान है।
वैकुण्ठ चतुर्दशी के व्रत व पूजा का विधान : प्रात:काल सूर्योदय के समय ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नानकर स्वच्छ वस्ïत्र धारण करना चाहिए। तत्पश्चात् आराध्य देवी-देवता की पूजा के उपरान्त अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गन्ध व कुश लेकर वैकुण्ठ चतुर्दशी के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूजा पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर करना चाहिए। आज के दिन भगवान् श्रीविष्णुजी तथा भगवान श्रीशिवजी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु 108 कमल पुष्पों से भगवान शिव की पूजा कर रहे थे, तब महादेव ने उनकी परीक्षा लेने के लिए एक कमल पुष्प गायब कर दिया। भगवान श्रीविष्णु शिवलिंग पर एक-एक करके कमल पुष्प चढ़ा रहे थे, अंत में एक पुष्प कम लगा। तब उन्होंने सोचा कि उनके नेत्र भी कमल के समान हैं, इसलिए वे अपने एक नेत्र को शिवलिंग पर अर्पित करने जा रहे थे, तभी भगवान शिवजी स्वयं प्रकट हुए और प्रसन्न होकर भगवान श्रीविष्णु जी को सुदर्शन चक्र प्रदान किया। साथ ही यह भी कहा कि जो भक्त पहले आपका पूजन-अर्चन करके, मेरी आराधना करेगा, उसे वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति होगी।