सनातन धर्म में आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को शरद पूॢणमा का प्रमुख पर्व हर्षोल्ïलास के साथ मनाने की धाॢमक व पौराणिक परम्परा है। शरद पूर्णिमा के पर्व को कौमुदी उत्सव, कुमार उत्सव, शरदोत्सव, रास पूॢणमा, कोजागरी पूर्णिमा एवं कमला पूॢणमा के नाम से भी जाना जाता है। इस पूॢणमा में अनोखी चमत्कारी शक्ति निहित है। ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि  ज्योतिष गणना के अनुसार संपूर्ण वर्ष में आश्विन शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि के दिन ही चंद्रमा षोडश कलाओं से युक्त होता है। षोडश कलायुक्त चंद्रमा से निकली किरणें समस्त रोग व शोक हरनेवाली बतलाई गई है। इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के सर्वाधिक निकट रहता है। इस रात्रि को दिखाई देने वाला चंद्रमा अपेक्षाकृत अधिक बड़ा दिखलाई पड़ता है।

ऐसी मान्यता है कि भू-लोक पर शरद पूॢणमा के दिन लक्ष्मीजी घर-घर विचरण करती हैं, जो जागृत रहता है उसपर अपनी विशेष कृपा-वर्षा करती हैं।  विमल जैन के अनुसार आश्विन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि 27 अक्टूबर, शुक्रवार की अद्र्धरात्रि के पश्चात 4 बजकर 18 मिनट पर लग रही है, जो कि 28 अक्टूबर, शनिवार को अद्र्धरात्रि के पश्चात 1 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। पूर्णिमा तिथि का मान 28 अक्टूबर, शनिवार को सम्पूर्ण दिन होने के फलस्वरूप स्ïनान-दान-व्रत एवं धार्मिक अनुष्ठान इसी दिन संपन्न होंगे।  इस बार शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रग्रहण लगने से समस्त धार्मिक अनुष्ठान के कृत्य सूतक प्रारंभ होने से पूर्व संपन्न होंगे। चंद्रग्रहण अद्र्धरात्रि 01 बजकर 13 मिनट से अद्र्धरात्रि 02 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। सूतक दिन में 4 बजकर 13 मिनट से लग जाएगा। इसके पूर्व में पूॢणमा से संबंधित समस्त धार्मिक अनुष्ठान करना चाहिए। 

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