अपनी राष्ट्रभाषा के बिना किसी देश की कल्पना नहीं की जा सकती है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दी गई दी थी। इसके 74 वर्ष बीत जाने के बावजूद हिंदी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा के रूप में तब्दील नहीं किया जा सका। राजभाषा के रूप में विभिन्न सरकारी विभागों में हिंदी के शत-प्रतिशत प्रयोग के बावजूद अभी भी लक्ष्य काफी दूर है। हिंदी दिवस के मौके पर हमें हिंदी के प्रति अपनी निष्ठा, वचनबद्धता, ममत्व, लगाव एवं भावनात्मक जुड़ाव प्रगट करने का मौका है। हिंदी के प्रचार-प्रसार, विकास और विस्तार के लिए संकल्प लेने का दिवस है। विश्व भर में हिंदी के प्रति चेतना जागृत करने के लिए हिंदी लेखकों, रचनाकर्मियों एवं साहित्यकारों की निष्ठा को सम्मानित करने का दिन है। साथ में हिंदी की वर्तमान स्थिति का अवलोकन एवं प्रगति पर चिंतन-मनन करने का दिवस भी है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में जनता और सरकार के बीच जन-जन की भाषा ही संपर्क भाषा के रूप में सार्थक भूमिका अदा कर सकती है। हिंदी भारत की भावनात्मक एकता को मजबूत करने का सशक्त माध्यम भी है।
आज जरुरत इस बात की है कि हिंदी का प्रचार-प्रसार केवल सरकारी स्तर पर ही सीमित न रहे बल्कि इसे जन-जन तक ले जाने की जरुरत है। दुनिया में भारत की बढ़ती धमक को मजबूत करने के लिए हिंदी भाषा का प्रकाश फैलाने की जरुरत है। भारत सरकार इस दिशा में प्रयत्नशील है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने विदेशी दौरों के दौरान हिंदी भाषा का ही ज्यादा प्रयोग कर रहे हैं जो एक सराहनीय कदम है। जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान विदेशी मेहमानों के साथ हुई बैठक के दौरान भी प्रधानमंत्री ने हिंदी में ही अपनी बात रखी। राजभाषा विभाग अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन का आयोजन अब दिल्ली से बाहर आयोजित कर रहा है। वाराणसी एवं सूरत के बाद तृतीय अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन का आयोजन 14 एवं 15 सितंबर को पुणे में आयोजित हो रहा है। देश के अमृतकाल में भारत में शिक्षा एवं तकनीकी के क्षेत्र में हिंदी का अधिक से अधिक प्रयोग किया जाए ताकि हिंदी सिर्फ राजभाषा नहीं बल्कि जन-जन की भाषा बने। देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए समस्त कार्य अपनी भाषा में किया जाना जरूरी है। इसके लिए सभी को मिलकर प्रयास करना होगा।
हिंदी में सबसे बड़ी समस्या टाइपिंग की आती थी, किंतु वह भी अब यूनिकोड आने के बाद पूरी तरह समाप्त हो गई है। राजभाषा विभाग के द्वारा अनेक प्रशिक्षण कार्यक्रम ऑनलाइन संपादित किये जा रहे हैं, लेकिन राजभाषा के कदमों को वास्तविक धरातल पर उतारने की जरुरत है ताकि हिंदी को असली मुकाम तक पहुंचाया जा सके। हिंदी एक समुद्र की तरह है जिसमें स्थानीय भाषाएं आकर मिलती हैं तथा इसको और समृद्ध बनाती हैं। हिंदी अंग्रेजी भाषा का विकल्प हो सकता है, किंतु वह क्षेत्रीय भाषाओं का विरोधी नहीं है। भारत सरकार की नई शिक्षा नीति में मातृभाषा के प्रयोग पर जोर दिया गया है जिससे क्षेत्रीय भाषाओं में नई ऊर्जा का संचार हुआ है। सरकार की इस नीति से हिंदी एवं स्थानीय भाषाओं के बीच और सहयोग बढ़ेगा। हिंदी समाज को तोड़ने का नहीं, बल्कि जोड़ने का काम कर रही है। हिंदी के विकास एवं प्रचार-प्रसार में गैर-हिंदीभाषी लेखकों एवं कवियों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
हिंदी को और समृद्ध बनाने के लिए विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा और न्यायपालिका के क्षेत्र में और काम करने की जरुरत है। इन क्षेत्रों में प्रयोग होने वाले अंग्रेजी शब्दों का हिंदी अनुवाद जरूरी है। सरकारी विभागों में केवल हिंदी माह, पखवाड़ा, सप्ताह एवं दिवस मनाने से ही काम नहीं चलेगा बल्कि हर दिन हिंदी के प्रयोग पर जोर देना होगा। हिंदी दिवस के अवसर पर सभी हिंदी प्रेमियों को पूर्वांचल प्रहरी की तरफ से हार्दिक शुभकामना।