जी-20 शिखर सम्मेलन में नई दिल्ली घोषणा-पत्र पर सहमति बनाकर भारत ने दुनिया में अपनी कूटनीति का लोहा मनवा दिया। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच घोषणा-पत्र पर सर्वसम्मति बनाना कठिन कार्य था, क्योंकि पश्चिमी देश रूस पर हमला करने की पूरी योजना के साथ भारत आए थे। रूस और चीन जैसे देश पश्चिमी देशों के आरोपों का मुंहतोड़ जवाब देने को तैयार थे। लेकिन भारत ने दोनों पक्षों के साथ बातचीत कर समाधान का रास्ता निकाला, जिससे  सहमति बन सकी। जी-20 शिखर सम्मेलन में 83 बिंदुओं पर सभी सदस्य देशों ने सहमति व्यक्त की जिसके आधार पर आगे काम होगा। भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि आर्थिक कॉरिडोर पर बनी सहमति रही जिसके तहत भारत को मध्य-पूर्व तथा यूरोप से जोड़ने के लिए समुद्र एवं रेल नेटवर्क से जोड़ने का मार्ग प्रशस्त होगा। दुनिया के आठ देश मिलकर काम करेंगे। यह परियोजना दस साल में पूरी होगी। इस परियोजना के पूरा होने से आर्थिक सहयोग बढ़ेगा तथा ऊर्जा के विकास एवं डिजिटल कनेक्टिविटी में तेजी आएगी। इस परियोजना में भारत के अलावा अमरीका, साऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इटली, फ्रांस, जर्मनी, यूरोपीय यूनियन शामिल हैं।

इस आर्थिक कॉरिडोर को चीन के बीआरआई तथा सी-पैक परियोजना का जवाब माना जा रहा है। चीन भारत में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन को विफल करने के लिए हरसंभव कोशिश कर रहा था। भारत ने आर्थिक कॉरिडोर बनाने पर आठ देशों की सहमति बनाकर चीन को करारा झटका दिया है। इटली तथा साऊदी अरब जैसे देश जो चीन के बीआरआई प्रोजेक्ट के हिस्सा थे को भारत ने बाहर निकाल कर अपने साथ जोड़ लिया है। साऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भारत के साथ द्विपक्षीय वार्ता कर यह दर्शा दिया कि वे पूरी तरह भारत के साथ हैं। दोनों देशों के बीच विभिन्न क्षेत्रों में काम करने पर सहमति बनी है जिसमें आर्थिक कॉरिडोर भी शामिल है। भारत ने साऊदी अरब को फिर से अमरीका के नजदीक लाकर चीन को करारा झटका दिया है। भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि अफ्रीकन यूनियन को जी-20 की स्थायी सदस्यता दिलाना है। 55 देशों का यह संगठन ग्लोबल साऊथ के नाम से जाना जाता है। इन देशों की आबादी लगभग डेढ़ अरब है। भारत अफ्रीकन यूनियन को जी-20 की स्थायी सदस्यता दिलाकर ग्लोबल साऊथ का नेता बन गया है।

अभी तक अफ्रीकी देशों में रूस एवं चीन का दबदबा था, किंतु भारत ने अपनी कूटनीतिक पहल से अफ्रीका में पैठ बना लिया है। प्राकृृतिक संसाधनों से भरपूर अफ्रीका महादेश में व्यापार एवं पूंजी निवेश की काफी संभावनाएं हैं। चीन की विस्तारवादी एवं कर्जजाल की नीति से परेशान अफ्रीकी देश भारत की तरफ आशा भरी नजरों से देख रहे हैं। कई अफ्रीकी देश यह चाहते हैं कि भारत उनके देश में निवेश करे ताकि चीन के विस्तारवाद को रोका जा सके। चीन ने कई अफ्रीकी देशों को कर्जजाल में फंसाकर अपना सामरिक बेस बना लिया है। जी-20 शिखर सम्मेलन के बाद अफ्रीकी देश अब भारत को अपना नेता मानने लगे हैं। अफ्रीकन यूनियन को सदस्य बनाने के लिए भारत ने अमरीका सहित पश्चिमी देशों को अपनी कूटनीतिक पहल से राजी किया। जी-20 शिखर सम्मेलन के सफल आयोजन से दुनिया में भारत का कद बढ़ा है जिसका लाभ भारत को भविष्य में मिलेगा।