नई दिल्ली में आगामी 9 एवं 10 सितंबर को आयोजित होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन के लिए तैयारियां जोरों पर है। इसको लेकर दिल्ली को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया है। विदेशी मेहमानों की सुरक्षा के लिए ड्रोन से चौकसी की जा रही है। पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के लगभग एक लाख तीस हजार जवान सुरक्षा में तैनात हैं। भारत जी-20 शिखर सम्मेलन को ऐतिहासिक बनाना चाहता है ताकि दुनिया में भारत की अलग पहचान बन सके। भारत में इस शिखर सम्मेलन के लिए ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का थीम रखा गया है। अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक, फ्रांस के राष्ट्रपति सहित लगभग सभी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष एवं शासनाध्यक्ष आ रहे हैं। केवल रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तथा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग जी-20 शिखर सम्मेलन में हिस्सा नहीं ले रहे हैं। पुतिन ने तो पहले से ही ऐलान कर दिया था कि वे मजबूरी के कारण इसमें हिस्सा नहीं ले पाएंगे। रूसी विदेशी मंत्रालय का कहना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पुतिन अपना ध्यान देश की समस्या पर केंद्रित कर रहे हैं। वे नहीं चाहते हैं कि जी-20 शिखर सम्मेलन के मंच पर पश्चिमी देशों के साथ आर-पार की स्थिति में आएं।
दूसरी बात यह है कि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय द्वारा पुतिन के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने से भी पुतिन भारत नहीं आना चाहते हैं। उनकी जगह विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव रूसी प्रतिनिधिमंडल का प्रतिनिधित्व करेंगे। सबसे अधिक चर्चा चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग की भारत यात्रा टालने को लेकर है। पहले चीनी राष्ट्रपति का भारत दौरा घोषित था, किंतु अंत में इसे रद्द कर दिया गया। दुनिया के नेताओं ने जिनपिंग के इस फैसले को निराशाजनक बताया है। सबको मालूम है कि लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक चीनी सीमा पर तनाव बना हुआ है। चीन ने हाल ही में एक नक्शा जारी कर भारत के अरुणाचल प्रदेश एवं अक्साई चिन को चीन का हिस्सा बता दिया है। यह केवल भारत के साथ ही नहीं हुआ है, बल्कि फिलीपींस, मलेशिया, वियतनाम, ताईवान एवं जापान के कुछ हिस्से को चीन ने अपनी विस्तारवादी सोच के तहत अपना हिस्सा बता दिया है। इस बार सभी देशों ने मजबूती के साथ चीन के इस कदम का विरोध किया है। चीन नहीं चाहता है कि भारत में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन सफल हो। विश्व तथा एशिया में भारत की बढ़ती ताकत चीन को रास नहीं आ रही है। शायद यही कारण है कि जिनपिंग भारत नहीं आना चाहते हैं।
जिनपिंग के शासन में चीन की आर्थिक स्थिति लगातार खराब हो रही है। जी-20 शिखर सम्मेलन में बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों से विकासशील देशों को अधिकतम ऋण देने, अंतर्राष्ट्रीय ऋण व्यवस्था में सुधार तथा क्रिप्टोकरेंसी जैसे मुद्दों पर विचार होना है। यह संगठन अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मुद्दों पर विचार करती है। वर्ष 1999 में एशियाई वित्तीय संकट के बाद जी-20 शिखर सम्मेलन का गठन हुआ। मालूम हो कि विश्व का लगभग 80 प्रतिशत जीडीपी, 75 प्रतिशत व्यापार तथा दो-तिहाई आबादी संगठन के इन्हीं 20 देशों के पास है। जी-20 में दुनिया के मजबूत 19 देश तथा यूरोपीय यूनियन सदस्य हैं। इसके अलावा भारत ने संयुक्त राष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व ट्रेड ऑर्गनाइजेशन एवं आसियान जैसे संगठनों को भी आमंत्रित किया है।
भारत ने दुनिया के नौ देशों को विशेष अतिथि के रूप में बुलाया है। अफ्रीकी विकास संगठन को भी आमंत्रित किया गया है। भारत अफ्रीकी देशों के विकास में विशेष दिलचस्पी दिखा रहा है। चीन ने भी अफ्रीकी देशों में भारी निवेश कर रखा है। अफ्रीकी देश चीन के कर्जजाल से बचने के लिए भारत की तरफ आशा भरी दृष्टि से देख रहे हैं। भारत भी अफ्रीकी देशों में निवेश बढ़ाने की दिशा में दिलचस्पी दिखा रहा है। यही कारण है कि चीन भारत को दुश्मन के रूप में देख रहा है। भारत जी-20 को सफल बनाकर चीन को उसकी औकात बताना चाहता है।