''यदा  यदा  हि  धर्मस्य  ग्लानिर्भवति  भारत: ।

अभ्युत्थानम  धर्मस्य  तदात्मानम  सृजाम्यहम:।

परित्राणाय  साधुनामविनाशाय  च  दुष्कृृताम

धर्मसंस्थापनार्थाय  सम्भवामि  युगे  युगे।'

(जब-जब धर्म  का क्षय होता  है  और अधर्म  का उत्थान होता है, तब-तब मैं  स्वयं  प्रकट  होता  हूं।  अच्छाइयों की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए, धर्म की दृढ़ता के लिए, मैं  हर युग  में  स्वयं  को  मानव  रूप  में  अवतरित  करता हूं।)  कृृष्ण जन्माष्टमी  भगवान  विष्णु के 8 वें  अवतार  भगवान कृृष्ण की जयंती  का  प्रतीक है, जो  भाद्र  मास के कृृष्ण पक्ष की अष्टमी  तिथि  को पड़ता है। श्रीकृृष्ण प्रेम, विश्वास, मित्रता  और शांति के प्रतीक  हैं। वह  सुरक्षा, करुणा  और  कोमलता के देवता  हैं।  वे  अपने  चरित्र   में  आदर्श  मित्र, बुद्धिमान  शिक्षक, दूरदर्शी  राजनेता, धर्मपरायण योगी  और  अजेय योद्धा, यानी  जीवन की विभिन्न  परस्पर  विरोधी गतिविधियों  का सामंजस्य स्थापित करते हैं।  श्रीमद् भगवदगीता, जिसे गीता के नाम से जाना जाता है, मानव  जाति को श्रीकृृष्ण का सर्वोत्तम पवित्र उपहार  है।  इसमें धर्म, कर्म, आस्तिक  भक्ति, यौगिक  आदर्शों, मोक्ष, ज्ञान  आदि जैसे जीवन के विभिन्न विषयों पर अर्जुन  को  दिए गए उनके परामर्श का संग्रह शामिल  है।

यह जीवन को  आध्यात्मिक  बनाने का मार्ग प्रशस्त  करता है और  आत्मा की चमक के साथ  इसके  नीरस एवं धूसर  चरणों  को भी आलोकित करता है। तीन  वैदिक शास्त्रों, अर्थात-उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद् गीता, को प्रस्थान-त्रई (वैदिक विचारों को समझने के लिए प्रारंभ के तीन बिंदु) कहा जाता है। उपनिषद में 'मंत्र', ब्रह्मसूत्र में 'सूत्र'और भगवद्गीता में 'श्लोक' हैं। उपनिषद केवल योग्यताधारियों के लिए ग्राहय हैं, और ब्रह्मसूत्र (जिसे वेदांत भी कहा जाता है) विद्वत और शिक्षित जनों के लिए उपयोग और महत्व के हैं, परन्तु गीता सबके लिए है। उसके अनुसार ''यदि संपूर्ण वेदांत दर्शन एक गाय है, तो पवित्र गीता दूध है। वे लोग, जो वास्तव में प्यासे हैं और सत्य के खोजी हैं, इस  अमृत को पीते हैं और  अमरत्व को प्राप्त करते हैं।'

 एक योद्धा के रूप में अपना कर्तव्य निर्वहन में अर्जुन की अनिच्छा के स्थिति में मानव-मूल्यों के रक्षार्थ गीता का संदेश निरूपित हुआ था। इसके पूरे 700 श्लोक भगवान कृृष्ण और उनके भक्त-मित्र अर्जुन के बीच अमर प्रवचन हैं, जो किसी मंदिर प्रांगण, एकांत वन या पर्वत़ की चोटी पर नहीं, वरन एक युद्धभूमि के बीचों-बीच में प्रस्फूटित हुआ था। महाभारत के कुरुक्षेत्र में धर्म युद्ध के दौरान अर्जुन की दुविधा  वस्तुत: मानव मन की सार्वभौमिक दुविधा है। प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करते समय अपने दैनिक जीवन में बड़ी या छोटी दुविधाओं का सामना करना पड़ता है। अर्जुन की सबसे बड़ी दुविधा यह थी कि उसे युद्ध लड़ते हुए अपने गुरु, संबंधियों और कई निर्दोष योद्धाओं को मारने तथा शांति एवं अहिंसा के रक्षार्थ युद्धभूमि से हट जाने के बीच चुनाव करना था। गीता एक योग शास्त्र है।

''योग'' शब्द सार्वभौमिक आत्मा के साथ व्यक्तिगत आत्मा के मिलन को दर्शाता है। यह विभिन्न प्रकार के मानवमनों - सक्रिय, दार्शनिक, भावनात्मक और  मानसिक-को ध्यान में रखता है और उनके लिए क्रमश: कार्य का मार्ग (कर्मयोग), ज्ञान का मार्ग (ज्ञानयोग), प्रेम और भक्ति का मार्ग (भक्तियोग), और एकाग्रता और आत्म-नियंत्रण का मार्ग (राजयोग) प्रशस्त करता है।  इनके अतिरिक्त इसमें यज्ञ, दान, तप, ध्यानयोग, प्राणायाम (श्वास पर नियंत्रण), हठयोग (शरीर का कठोर अनुशासन आदि), लययोग आदि का सटिक वर्णन है। गीता को ''ब्रह्मविद्या'' यानी परमात्मा का विज्ञान और ''मोक्षशास्त्र'' यानी मुक्ति से संबंधित शास्त्र की संज्ञा दी जाती है। कृृष्ण की शिक्षा का उद्देश्य उन शंकाओं एवं भ्रमों को दूर करना है जो मनुष्य को छोटे एवं बड़े हर चीज में दृष्टिगोचर होते हैं, परन्तु इन्हें केवल सत्य की अनुभूति के माध्यम से हीं दूर किया जा सकता है। गीता में, श्रीकृृष्ण स्वधर्म पर जोर देते हैं। वास्तव में, ''धर्म'' शब्द का अनुवाद नहीं किया जा सकता है और ''रिलिजन'', ''कर्तव्य'', ''नीतिपरायणत'' या अन्य समकक्ष शब्द केवल इसके आंशिक अर्थ प्रदान करते हैं। 


  ई. प्रभात किशोर

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