नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा वन नेशन, वन इलेक्शन की तरफ कदम बढ़ाने के साथ ही राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। विपक्षी पाॢटयां सरकार के इस पहल को अपने हितों के खिलाफ मान रही हैं। यही कारण है कि विपक्षी पाॢटयां इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। केंद्र सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोंिवंद के नेतृत्व में आठ सदस्यीय उच्च स्तरीय कमेटी का गठन कर दिया है। यह कमेटी वन नेशन, वन इलेक्शन के बारे में लाभ-हानि का पूरा अध्ययन कर सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। समिति में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी, गुलाम नबी आजाद, वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष एनके ङ्क्षसह, पूर्व लोकसभा महासचिव सुभाष सी कश्यप, वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे और पूर्व सतर्कता आयुक्त संजय कोठारी भी सदस्य बनाए गए हैं। कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में हिस्सा लेंगे, जबकि कानूनी मामलों के सचिव नीतेश चन्द्रा समिति के सचिव बनाए गए हैं।

हालांकि अधीर रंजन चौधरी ने समिति में शामिल होने से इनकार कर दिया। समिति यह भी सिफारिश करेगी कि क्या संविधान में संशोधन के लिए राज्यों के अनुमोदन की आवश्यकता होगी या नहीं। मोदी सरकार ने 18 सितंबर से संसद के दोनों सदनों का विशेष सत्र बुलाने की घोषणा की है, जिसमें वन नेशन, वन इलेक्शन से संबंधित विधेयक लाया जा सकता है। ऐसी खबर है कि सरकार महिला आरक्षण विधेयक तथा समान नागरिक संहिता से संबंधित विधेयक भी ला सकती है। देश की विपक्षी पाॢटयों को संदेह है कि केंद्र सरकार वन नेशन, वन विधेयक की आड़ में लोकसभा चुनाव को टाल सकती है। केंद्र की इस पहल से मुंबई में हुई विपक्षी पाॢटयों की बैठक का एजेंडा ही बदल गया। सरकार के खिलाफ बनने वाली रणनीति का फोकस वन नेशन, वन इलेक्शन की तरफ चला गया। वर्ष 1951 से लेकर 1967 तक देश में लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ होते थे, लेकिन 1967 के बाद स्थिति बदल गई।

देश की क्षेत्रीय पार्टियों का मानना है कि लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने से राष्ट्रीय मुद्दे हावी हो जाते हैं तथा क्षेत्रीय मुद्दे गौण हो जाते हैं। इसका लाभ राष्ट्रीय पाॢटयों को ज्यादा मिलेगा। क्षेत्रीय पाॢटयों का मानना है कि वन नेशन, वन इलेक्शन होने से उनकी राजनीति सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। एक साथ चुनाव कराने के लिए लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा तथा संविधान में संशोधन करने की जरुरत भी होगी। कई विधानसभाओं के कार्यकाल को बढ़ाना पड़ेगा तथा कई विधानसभाओं का कार्यकाल घटाना पड़ेगा। संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि एक साथ चुनाव कराने से धन और समय दोनों की बचत होगी। सरकारें चुनाव का फिक्र छोड़कर विकास कार्य में जुट जाएंगी। सबसे बड़ी बात यह है कि इसकी घोषणा तब हुई जब विपक्ष मुंबई में बैठक कर रहा था। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि सरकार विपक्षी एकता से डर कर काम कर रही है।

हालांकि विपक्षी पाॢटयों की बैठक में समन्वय समिति के गठन के अलावा कुछ भी नहीं हुआ। न संयोजक के मुद्दे पर सहमति बनी और न ही सीटों के तालमेल के बारे में कोई गंभीर चर्चा हुई। राजनीतिक पाॢटयों के अपने अपने एजेंडे के कारण सीटों का तालमेल के मुद्दे को अगली बैठक तक के लिए टाल दिया गया। ऐसी खबर है कि जिस तरह कांग्रेस ने विपक्षी दलों की बैठक को हाईजैक किया तथा राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करने की कोशिश की उससे ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, अरङ्क्षवद केजरीवाल नाराज हो गए। अपने अपने राज्यों में क्षेत्रीय पाॢटयों के वर्चस्व की लड़ाई ने कांग्रेस के सामने गंभीर समस्या पैदा कर दी है। जैसे ही सीटों के तालमेल का मुद्दा उठेगा गठबंधन के सामने अस्तित्व बचाने की समस्या आ जाएगी। अब सब कुछ सरकार अगले कदम और विपक्ष की अगली बैठक पर निर्भर करेगा।