इन दिनों सामान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर राजनीतिक हल्कों में घमासान मचा हुआ है। इस पर प्रधानमंत्री मोदी नेे मंगलवार को कहा था कि भारत दो कानूनों पर नहीं चल सकता और भारत के संविधान में भी नागरिकों के समान अधिकार की बात कही गई है।  उन्होंने  कहा कि सरकार देख रही है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड के नाम पर लोगों को भड़काने का काम हो रहा है। एक घर में एक सदस्य के लिए एक कानून हो और दूसरे के लिए दूसरा तो घर चल पाएगा क्या? तो ऐसी दोहरी व्यवस्था से देश कैसे चल पाएगा? पीएम के इस बयान के बाद यूसीसी पर राजनीतिक बहस छिड़ गई है। कई विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि पीएम मोदी ने कई राज्यों में चुनाव नजदीक आने पर राजनीतिक लाभ के लिए यूसीसी का मुद्दा उठाया।

कांग्रेस का आरोप है कि पीएम मोदी महंगाई, बेरोजगारी और मणिपुर की स्थिति जैसी वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए यूसीसी मुद्दे का इस्तेमाल कर रहे हैं। एआईएमएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना करते हुए कहा कि भारत के प्रधानमंत्री भारत की विविधता और इसके बहुलवाद को एक समस्या मानते हैं।  इसलिए वह ऐसी बातें कहते हैं।  शायद भारत के प्रधानमंत्री को अनुच्छेद 29 के बारे में नहीं पता। क्या आप  यूसीसी के नाम पर देश से उसकी बहुलता और विविधता को छीन लेंगे? इसके अलावा 30 से अधिक आदिवासी संगठनों ने भी यूसीसी का विरोध जताते हुए आशंका जताई कि इससे उनके प्रथागत कानून कमजोर हो जाएंगे।

आदिवासी संगठनों का कहना है कि हम विभिन्न वजहों से यूसीसी का विरोध करते हैं। हमें डर है कि दो आदिवासी कानून- छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट यूसीसी के कारण प्रभावित हो सकते हैं। ये दोनों कानून आदिवासी भूमि की रक्षा करते हैं। यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) का मतलब है, भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून होना,चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो यानी हर धर्म, जाति, लिंग के लिए एक जैसा कानून हो। अगर सिविल कोड लागू होता है तो विवाह, तलाक, बच्चा गोद लेना और संपत्ति के बंटवारे जैसे विषयों में सभी नागरिकों के लिए एक जैसे नियम होंगे। हां, समान नागरिक संहिता भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 का हिस्सा है। 

संविधान में इसे नीति निदेशक तत्व में शामिल किया गया है।  संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करना सरकार का दायित्व है। अनुच्छेद 44 उत्तराधिकार, संपत्ति अधिकार, शादी, तलाक और बच्चे की कस्टडी के बारे में समान कानून की अवधारणा पर आधारित है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में समान नागरिक संहिता लागू करने को कहा है। 1985 में शाहबानो के मामले में फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद को एक समान नागरिक संहिता की रूपरेखा बनानी चाहिए, क्योंकि ये एक ऐसा साधन है जिससे कानून के समक्ष समान सद्भाव और समानता की सुविधा देता है। दूसरी ओर 22वें विधि आयोग की ओर यूनिफॉर्म सिविल कोड पर लोगों की राय इकठ्ठा करने की प्रक्रिया चल रही है। दो हफ्तों में 8.5 लाख व्यक्ति और संस्थान अपनी अपनी राय भेज चुके हैं, इनमें से कई संस्थानों ने आयोग को चिठ्ठी लिखकर यह याद दिलाया कि 21वें विधि आयोग ने यूनिफॉर्म सिविल कोड को ठुकरा दिया था। 21वें विधि आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति बी.एस चौहान थे और आयोग ने दो साल के शोध और चर्चा के बाद 2018 में रिफॉर्म ऑफ फैमिली विषय पर एक परामर्श पत्र जारी किया था।

इस पेपर में आयोग ने लिखा था कि यह एक बहुत बड़ा विषय है और देश में इसके संभावित परिणाम अनपेक्षित हैं। आयोग के मुताबिक देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर सर्वसम्मति नहीं है और ऐसे में सबसे अच्छा तरीका यही होगा कि निजी कानूनों की विविधता का संरक्षण किया जाए लेकिन यह भी सुनिश्चित किया जाए कि निजी कानून संविधान  की ओर से दिए गए मूलभूत अधिकारों का खंडन न करें। इसी आधार पर आयोग ने कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड ना तो जरूरी है और ना वांछनीय। आयोग ने यह भी जोड़ा कि अधिकांश देश अब असमानताओं को सम्मान देने की तरफ बढ़ रहे हैं क्योंकि असमानताओं का मतलब भेद-भाव नहीं होता है, बल्कि वे तो एक मजबूत लोकतंत्र का सूचक होती हैं।