हिंदू धर्म में चातुर्मास का विशेष महत्व माना जाता है। यह आषाढ़ी एकादशी या देवशयनी एकादशी से शुरू होता है। देवशयनी एकादशी से देवोत्थानी एकादशी दोनों के बीच का जो समय होता उसे चातुर्मास कहा जाता है। इस बार चातुर्मास 29 जून दिन गुरुवार से आरंभ होकर 23 नवम्बर तक रहेगा। चातुर्मास में मांगलिक कार्यों जैसे विवाह, उपनयन संस्कार, मुंडन संस्कार, गृह प्रवेश आदि का आयोजन नहीं होता है। चातुर्मास के चार महीनों में श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक मास शामिल हैं।
मांगलिक कार्यों की शुरुआत देवोत्थानी एकादशी से होती है। मान्यता है कि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए आराम करने यानी कि शयन के लिए क्षीर सागर में चले जाते हैं। हिंदू धर्म में मंगलिक कार्यों में देवताओं का आह्वाहन करना अनिवार्य होता है। हालांकि योगनिद्रा में जाने से भगवान विष्णु उपस्थित नहीं हो पाते हैं। इसलिए मांगलिक कार्य बंद चातुर्मास में नहीं किए जाते हैं। चातुर्मास में कुछ खास नियमों का पालन करने से विशेष कृृपा प्राप्त होती है।
चातुर्मास में भूमि पर सोने से व्यक्ति को जीवन में धन की कमी नही होती है। इस दौरान व्यक्ति को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इसके अलावा पत्तल पर भोजन भी करना चाहिए। उपवास व दान करने से विशेष लाभ मिलता है। इसके अलावा सभी बुराईयों का त्याग कर देना चाहिए। मदिरापान आदि का सेवन भी नहीं करना चाहिए।