मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से करीब 70 किलोमीटर दूर बाजना नामक गांव में स्थित इस रहस्यमय कुंड का नाम भीमकुंड है। आपको नाम से ही पता चल गया होगा कि इस कुंड का नाता जरूर महाभारत काल से जुड़ा है। भीमकुंड की कहानी कुछ ऐसी है कि महाभारत काल में जब अज्ञातवास के दौरान पांचों पांडव और उनकी पत्नी पांचाली यानी द्रोपदी एक वन से गुजर रहे थे। तब भटकते -भटकते द्रोपदी को प्यास लगी। द्रोपदी को प्यासा पांचों भाइयों ने आस-पास पानी की खूब तलाश की। मगर, कहीं भी पानी का कोई स्रोत नहीं मिला। कथा के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने नकुल को याद कराया कि उसके पास ऐसी क्षमता है कि वह पाताल की गहराई में मौजूद जल का पता लगा सकता है। युधिष्ठिर के कहने पर उनके छोटे भाई नकुल ने धरती को छूकर ध्यान लगाया।
ध्यान लगाने से नकुल को पता चल गया कि किस जगह पर जल स्रोत मौजूद है। धरती में नीचे पानी का पता तो चल गया, लेकिन इस पानी को बाहर कैसे निकला जाए यह समस्या जैसी की तैसी बनी रही। जब द्रोपदी प्यास से व्याकुल हो उठीं तो गदाधारी भीम को गुस्सा आ गया। उन्होंने अपनी गदा उठाई और जिस जगह पर नकुल ने पानी का स्थान बताया था उसी जगह पर अपनी गदा से जोरदार प्रहार किया। भीम की गदा के प्रहार से धरती की कई परतों में छेद हो गया और पानी दिखाई देने लगा। लेकिन धरती की सतह से पानी लगभग तीस फीट नीचे था। ऐसी स्थिति में युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा कि अब तुम्हें अपनी धनुर्विद्या के कौशल से पानी तक पहुंचने का मार्ग बनाना होगा। यह सुनकर अर्जुन ने धनुष पर बाण चढ़ाया और अपने बाणों से पानी तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बना दीं।
आखिरकार धनुष से बनी सीढ़ियों से द्रौपदी को पानी तक ले जाया गया। यह कुंड भीम की गदा के प्रहार से बना था इसलिए इसे भीमकुंड के नाम से जाना गया। भीमकुंड को लेकर मान्यता है कि यह एक शांत ज्वालामुखी है। इसकी गहराई की बात करें तो अब तक कई भू-वैज्ञानिकों ने और कई गोताखोरों ने इसकी गहराई का पता लगाने का खूब प्रयास किया। मगर, किसी को भी कुंड का तल नहीं मिला। भू-वैज्ञानिकों के लिए भीमकुंड की गहराई आज भी एक रहस्य ही बनी हुई है।