भारत इतिहास के एक नए युग की शुरुआत कर रहा है।  दूसरे शब्दों में कहें तो इतिहास का पुनर्लेखन किया जा रहा है। यह वह इतिहास है जो छठी से 12वीं कक्षा तक स्कूलों में छात्र-छात्राओं को पढ़ाया जाता है। अधिकारियों ने राष्ट्रवाद को लेकर महात्मा गांधी की असहमति के साथ-साथ अन्य घटनाओं से जुड़े कुछ संदर्भों को हटाने के लिए इतिहास और राजनीति की पाठ्य-पुस्तकों में बदलाव किया है। कई लोगों का तर्क है कि सारा इतिहास समकालीन इतिहास है और यह हमेशा विजेताओं द्वारा लिखा जाता है। इसका अर्थ यह निकलता है कि आज भारत में जो कुछ  हो रहा है वह नया या आश्चर्यजनक नहीं है।

जब अंग्रेजों ने भारत पर शासन किया तो उन्होंने खुद की इतिहास की कहानी रची। जब भारत आजाद हुआ, उसके बाद के दशकों में कांग्रेस का वर्चस्व रहा और परिणामस्वरूप इतिहास के पाठ्यक्रम को उसके हितों के अनुरूप बनाया गया और  फिलहाल  खुद के संस्करण को आगे बढ़ाने के लिए इतिहास को अपनी दासी के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन, क्या मामला वाकई इतना सरल है? सरल शब्दों में कहें तो यह अतीत को समझने का एक प्रयास है कि हमने क्या गलतियां कीं और कौन से गलत कदम उठाए ताकि हम ऐसी समान गलतियों से बच सकें और एक बेहतर भविष्य बना सकें।

बेशक, हम अतीत के गौरव के बारे में भी सीखते हैं और यह भी कि कैसे हम अभी भी अपने भविष्य के प्रयासों में उन सफलताओं को हासिल कर सकते हैं, जिस तरह एक हड्डी या कंकाल का वैज्ञानिक अध्ययन करने से एक वैज्ञानिक सूचना मिलती है कि मृतक किस तरह का जीवन जी रहा था और उसकी मृत्यु का कारण क्या था, एक इतिहासकार भी अतीत के समाजों, संस्कृृतियों, अर्थव्यवस्थाओं और उनकी तकनीकों का अध्ययन करता है - या उनकी कमी का अध्ययन करता है - यह निर्धारित करने के लिए कि हम आज जहां हैं वहां हम कैसे पहुंच गए हैं और हमें आगे कैसे बढऩा चाहिए। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि अतीत को समझने में हमें केवल अपनी कल्पना या इच्छाओं से सहायता नहीं मिलती है।

हम स्रोतों पर निर्भर होते हैं जो हमें अतीत का जायजा लेने में मदद करते हैं। स्रोतों से तात्पर्य कलाकृृतियों, लिखित शब्दों, दस्तावेजों, कालक्रमों, पुस्तकों आदि से है, जो अध्ययन की वजह से लंबे वक्त से  जिंदा हैं। ये वही हैं जो हमें अतीत की अच्छी या बुरी घटनाओं के बारे में बताते हैं। इस प्रकार,अतीत से अज्ञात नए स्रोतों और सबूतों की खोज हमारे अतीत के बारे में हमारे ज्ञान और समझ की समीक्षा करने में परिणत होती है। अतीत की घटनाओं की कोई भी व्याख्या जो साक्ष्य एवं तथ्यों से समर्थित नहीं है, वह इतिहास नहीं बल्कि मिथक-इच्छाधारी सोच है। इतिहास-लिखित हो या भौतिक, साक्ष्य के आधार पर अतीत का अध्ययन, धीरे-धीरे लेकिन क्रमश: मिथक में बदल रहा है - एक काल्पनिक अतीत जो किसी भी तथ्य, कमजोर या मजबूत द्वारा समर्थित नहीं है। हम अपनी इच्छानुसार सोच के मुताबिक इतिहास को गढऩे में लगे हैं और यह हमारे भविष्य के लिए खतरे को दर्शाता है। कुल मिलाकर हम अपनी  सही सोच से दूर हो जाते हैं।

निरपेक्षता अब हमारी सोच का अंश नहीं रहा है।  हम सबकुछ अपने अनुकूल ढालने का प्रयास कर रहे हैं, जो सच्चाई पर पर्दा डालने के सिवाय और कुछ नहीं है। इसलिए समय को समझने की जरूरत है, इसको समझे बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते।  बदलते समय में बहुत सारी खामियां आ जाती हैं, जो आने वाले समय को भी प्रभावित करती हैं। कालचक्र को भ्रम और गलत जानकारी के सहारे नहीं छोड़ सकते। हमें कतई नहीं भूलना चाहिए कि इतिहास सत्य पर आधारित होता है, जबकि कहानियों की पृष्ठभूमि कोरी कल्पना होती है। हमें  गलत और सही को अलग-अलग समझने की जरूरत है।