वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव को देखते हुए विपक्षी पार्टियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देने के लिए एकजुट होने का प्रयास कर रही हैं। विपक्षी नेता एक-दूसरे के दरवाजे पर पहुंचकर अपनी-अपनी रणनीति का खुलासा कर रहे हैं। सभी विपक्षी नेता मोटे तौर पर एकता के पक्ष में बयान तो दे रहे हैं किंतु भीतर-भीतर वोट बैंक खोने का भय भी सता रहा है। आगामी 12 जून को पटना में देश के प्रमुख विपक्षी दलों की एक बैठक होने वाली है, जिसमें अगली रणनीति पर विस्तार से चर्चा होगी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्षी नेताओं से भेंटकर सभी दलों को एकजुट होने का प्रयास कर रहे हैं। नीतीश कुमार का कहना है कि वे वर्ष 2024 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं किंतु मोदी को सत्ता से हटाने के लिए सभी दलों को लामबंद कर रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अधिकारियों के ट्रांसफर एवं पोस्टिंग के मामले में केंद्र द्वारा लाए गए अध्यादेश के मुद्दे पर विपक्षी पार्टियों को एकजुट करने में लगे हैं। उनका कहना है कि यह मामला आम आदमी पार्टी (आप) का नहीं बल्कि देश की जनता से जुड़ा है। लेकिन मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इस मुद्दे पर अभी तक अपना पत्ता नहीं खोल रही है।

अरविंद केजरीवाल ने सत्ता में आने से पहले कांग्रेस के नेताओं पर जो अभद्र एवं तीखी टिप्पणी की थी उसको भुलाने के लिए कांग्रेस तैयार नहीं है। अपनी मुहिम असफल होते हुए केजरीवाल ने कांग्रेस पर मोदी का समर्थन देने का आरोप भी लगा दिया है। इधर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बंगाल से एकमात्र कांग्रेसी विधायक को टीएमसी में शामिल होने की अनुमति देकर कांग्रेस को बड़ा झटका दिया है। सागर दिघि के विधायक के टीएमसी में शामिल होने से कांग्रेस बौखला गई है। 294 सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधानसभा में टीएमसी के 221 सदस्य हैं। इसके बावजूद टीएमसी का कांग्रेस विधायक को अपने पाले में लाना दूरगामी रणनीति का संकेत देता है। मालूम हो कि पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान सागर दिघि विधानसभा में टीएमसी को 50 प्रतिशत मत मिले थे किंतु इस बार हुए उपचुनाव में केवल 35 प्रतिशत मत हासिल हुए हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस विधानसभा में 68 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस के समर्थन में वोट दिया है जो परंपरागत रूप से टीएमसी के वोट बैंक हैं। ममता बनर्जी नहीं चाहती है कि दूसरे विधानसभा क्षेत्रों में इस तरह की स्थिति बने।

इससे नाराज कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव जयराम रमेश ममता बनर्जी पर मोदी से मिलीभगत का आरोप भी लगा दिया है। अगर ऐसी स्थिति रही तो विपक्षी एकता किस तरह बन पाएगी। प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ विपक्ष के एकजुट होने का नारा मजाक बनकर रह जाएगा। विपक्षी एकता में सबसे बड़ी बात यह है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी अपनी सीटों का बलिदान देने के लिए तैयार नहीं होगी। राजनीतिक पार्टियों को अपने कार्यकर्ताओं को दूसरे दलों के उम्मीदवारों को वोट देने के लिए राजी करना भी चुनौती होगी। कई बार ऐसा देखा गया है कि जो राजनीतिक पार्टियां चुनाव के वक्त जल्दीबाजी में गठबंधन तो कर लेती है लेकिन कार्यकर्ता मानसिक रूप से तैयार नहीं पाते। इसका नतीजा यह होता है कि वोटों की अदला-बदली नहीं हो पाती है। राजनीतिक पार्टियों के बड़े चेहरे गठबंधन के लिए अपनी सीटों के लिए कुर्बानी देने के लिए तैयार नहीं होते। कुछ मुद्दों को लेकर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के बीच मतभेद होता है। गठबंधन बनने से कई मुद्दे को तिलांजलि देनी पड़ती है जिससे भविष्य में राजनीतिक हानि होने की आशंका बनी रहती है। कई राज्य जैसे पश्चिम बंगाल, केरल आदि में कांग्रेस तथा वामपंथी पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी हैं। अगर उनमें समझौता होता है तो वहां की जनता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। पश्चिम बंगाल के मामले में भी ऐसा देखा जा रहा है। ममता बनर्जी किसी भी कीमत पर कांग्रेस या वामपंथी पार्टियों को तरजीह देकर अपने वोट बैंक को नुकसान होने देना नहीं चाहती। कुल मिलाकर  विपक्षी एकता का रास्ता इतना आसान दिखता नजर नहीं आ रहा। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी भी विपक्षी चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।