पिछले पांच दिनों से चल रही उठा-पटक के बाद आखिरकार कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को फिर से कर्नाटक की कमान सौंप दी गई है। कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष डीके शिव कुमार को उप मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। कांग्रेस के राषट्रीय महासचिव केसी वेणु गोपाल ने आज इसकी घोषणा करते हुए कहा कि शपथ ग्रहण 20 मई को होगा। कर्नाटक विधानसभा चुनाव का परिमाण घोषित होने के बाद से ही मुख्यमंत्री पद को लेकर सिद्धारमैया एवं शिव कुमार के बीच रस्सा-कस्सी चल रही थी। दोनों में से कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं था। इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस में पिछले पांच दिनों से मैराथन बैठक चल रही थी। अंत में एक फॉर्मूले के तहत इस पर सहमति बनी है हालांकि इस फॉर्मूले को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। राजनीति पर्यवेक्षक इसके स्थायित्व को लेकर संदेह व्यक्त कर रहे हैं। जो भी हो, फिलहाल यह संकट टल गया है।

सिद्धारमैया सर्वप्रथम 1983 में निर्दलीय विधायक के रूप में निर्वाचित हुए थे। उसके बाद 1994 में जनता दल की सरकार में कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री थे। उसके बाद एचडी देवगौड़ा से मतभेद के बाद वर्ष 2008 में कांग्रेस में शामिल हुए थे तथा 2013-18 तक कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे। ऐसी खबर है कि कर्नाटक के   कांग्रेस के 135 विधायकों में से 95 विधायकों ने सिद्धारमैया का समर्थन किया है। कर्नाटक के पिछड़े, दलित एवं मुस्लिम मतदाताओं में सिद्धारमैया काफी लोकप्रिय हैं। कांग्रेस का मानना है कि उनको मुख्यमंत्री बनाने से अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को लाभ होगा। इन तीनों जातियों का कर्नाटक में 61 प्रतिशत जनसंख्या है। कांग्रेस सिद्धारमैया के माध्यम से अगले लोकसभा चुनाव में इन मतदाताओं को साधने का प्रयास कर रही है।  दूसरी बात यह है कि शिव कुमार के खिलाफ भ्रष्टाचार सहित कई मामले में केस लंबित हैं। कांग्रेस का मानना है कि उनको मुख्यमंत्री बनाने से केंद्र सरकार फिर से उनकी जांच प्रक्रिया तेज कर सकती है। इससे कांग्रेस की किरकिरी होगी।

दूसरी बात यह है कि कर्नाटक के डीजीपी को केंद्र सरकार ने सीबीआई का नया डायरेक्टर बना दिया है। शिव कुमार और डीजीपी के बीच की तल्खी जग जाहिर है। वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव में भाजपा को कर्नाटक के 28 सीटों में से 27 पर जीत मिली थी। इस बार कांग्रेस पिछड़ों, दलितों एवं मुस्लिम मतदाताओं के माध्यम से अपनी स्थिति मजबूत करना चाहेगी। सिद्धारमैया की छवि शिव कुमार के मुकाबले स्वच्छ है। हालांकि उनके खिलाफ भी एक दर्जन से ज्यादा केस लंबित हैं। सिद्धारमैया एक अनुभवी राजनेता हैं। इसलिए वे पूरे मामले को अपनी कुशलता से सुलझा सकते हैं। इस बार कर्नाटक के मुस्लिम मतदाताओं ने जनता दल-एस से हटकर कांग्रेस की तरफ एकतरफा मतदान किया है। भाजपा को हराने के लिए मुस्लिम मतदाता एकजुट हुए हैं। यही कारण है कि अनेक मुस्लिम विधायक जीतकर आए हैं।

कर्नाटक में अब मुस्लिम विधायकों में उप मुख्यमंत्री पद मुस्लिम विधायक को देने तथा महत्वपूर्ण मंत्रालय आवंटित करने की मांग की जा रही है। मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री पद के लिए नाम निर्धारित करने से ही समस्या का हल नहीं हो जाएगा बल्कि अब मंत्री पद के लिए भी घमासान होगा। सिद्धारमैया और शिव कुमार भी अपने-अपने गुट को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने के लिए जोर देंगे। बेंगलुरु से लेकर दिल्ली तक शह और मात का खेल चलेगा। मुस्लिम विधायकों का ग्रुप भी इस मामले में पीछे नहीं रहेगा। कुल मिलाकर मंत्रिमंडल के गठन को लेकर भी कांग्रेस हाईकमान को सभी गुटों को संतुष्ट करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। सिद्धारमैया के सर पर कांटों का ताज है, जिस पर सबकी नजर है। इसकी पहली परीक्षा 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव के दौरान होगी।