चार्य श्री महाश्रमणजी को कौन नहीं जानता? क्या सूर्य के प्रकाश से भी कभी कोई अपरिचित रह सकता हैं? महातपस्वी, महाश्रमणजी प्रकाश पुंज हैं। वे स्वयं प्रकाशमान हैं और परिपार्श्व के वातावरण को भी प्रकाशमय बनाते हैं । पूज्य श्री का जीवन स्फटिक जैसा पारदर्शी है, जिसमें प्रत्येक मानव का वास्तविक स्वरूप साक्षात प्रकट हो जाता है । आचार्य श्री तुलसी के पास जब मुनि मुदित शिष्य रूप में आए, तब गुरु तुलसी की पेन्नी नजरों ने मुनि मुदित की आतंरिक क्षमताओं को देखा-परखा, फिर एक दिन जनता के बीच प्रवचन में  मुनि मुदित को आगे बुलाया, महाश्रमण पद पर प्रतिष्ठित कर दिया । फिर गुरु तुलसी ने जनता से कहा -हम जो काम करते हैं, चिंतनपूर्वक करते हैं, परमाशपूर्वक करते हैं, भावुकतावश किसी को आगे नहीं लाते । मैंने जो किया है पूरे विश्वास के साथ किया है । गुरुदेव ने यह भी फरमाया कि महाश्रमण प्रत्येक महीने की पहली तारीख उपवास व ध्यान में बिताता है। उसमें अनासक्ति, आध्यात्मिकता, नैसर्गिकता कूट कूट के भरी है। यश, ख्याति, नाम की कोई भूख नहीं है। सहजतामय जीवन जीता है। दायित्वा का निर्वाह अच्छी तरह से करता है। मुझे संतोष है कि महाश्रमण अपने स्थान पर उपयुक्त है। युगप्रधान आचार्य महाश्रमणजी एक ऐसे गुरु हैं जो स्वयं के साथ-साथ दूसरों का उपकार करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं । जंगलों पहाड़ों में जाकर साधना करनेवाले बहुत मिलेंगे लेकिन भौतिक आकर्षणों के बीच रहकर अनासक्त जीवन जीने वाले गुरु महाश्रमण जैसे दुर्लभ हैं। जन जन की ये अनुभूति है कि पूज्यश्री का अणु-अणु ज्ञानमय हैं, साधनामय हैं। वार्तालाप में अल्पभाषी साथ ही मुस्कराहट की झलक, अनुशासन में दृढ़ व दक्ष हैं । स्वयं अनुशासन का पालन करने के कठोर पक्षधर हैं। आचार व्यवहार में सात्विक, अतिसहज होते हुए भी वे अपनी मर्यादा, नियमों के प्रति बड़े जागरूक हैं  संस्कृत, प्राकृत जैसी प्राचीन भाषाओं पर आपका असाधरण अधिकार है। निस्संदेह आचार्य महाश्रमण उस प्रज्ञा का नाम है जो अपने अथाह आगम ज्ञान से जनता को आध्यात्म का गहन बोध दे रहे हैं। ऐसे युगप्रधान महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी के 50 वें संयम पर्याय के उपलक्ष्य में आगम वाणी से मंगल कामना करते हैं -

इहं सि उत्तमो भंते! पेच्चा होहिसि उत्तमो

लोगुत्तमुत्तमं ठाणां, सिंहि गच्छसि निरओं

हैं विश्ववन्द्य, युगदृष्टा, श्री भैक्षवगण प्रतिपाल

महाश्रमण  जैसे गुरु मिले, हम सचमुच मालोमाल ॥