महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के सुप्रीमो शरद पवार के अचानक इस्तीफे के बाद महाराष्ट्र में सियासी हलचल तेज हो गई है। एक तरफ एनसीपी में बैठकों का दौर चल रहा है तो दूसरी तरफ महाविकास अघाड़ी गठबंधन में भी कई तरह की चर्चा है। एनसीपी के नेता और कार्यकर्ता पवार से अपना इस्तीफा वापस लेने की मांग कर रहे हैं। इसके समर्थन में एनसीपी के कई नेताओं ने अपने-अपने पदों से इस्तीफा भी दे दिया है। पवार ने अपने फैसले पर पुनॢवचार के लिए पार्टी से दो-तीन दिन का समय मांगा है। पवार का अंतिम फैसला क्या होगा अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं है। लेकिन पार्टी दोनों विकल्पों पर काम कर रही है। अगर पवार ने अपना इस्तीफा वापस नहीं लिया तो पार्टी का अगला उत्तराधिकारी कौन होगा, इस पर चर्चा शुरू हो गई है। उनके उत्तराधिकारी के लिए उनके भतीजे अजित पवार तथा उनकी बेटी सुप्रिया सुले का नाम सबसे आगे चल रहा है।
राजनीति के माहिर खिलाड़ी शरद पवार ने बड़ी सोची समझी राजनीति के तहत इस्तीफा देने का फैसला किया है। हो सकता है कि पवार पार्टी में अपनी लोकप्रियता को परखना चाहते हों। अगर उन्होंने अपना इस्तीफा वापस लिया तो हो सकता है कि पार्टी में दो कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति हो तथा युवा वर्ग के प्राथमिकता मिले। भाजपा से हाथ मिलाने के मुद्दे पर पहले से ही एनसीपी दो गुटों में बंटी हुई है। अजित पवार चाहते हैं कि एनसीपी भाजपा से हाथ मिलाकर महाराष्ट्र में सरकार का गठन करे। अगर पवार अपने इस्तीफे पर अड़े रहते हैं तो हो सकता है कि पवार की बेटी सुप्रिया सुले को एनसीपी की कमान मिले तथा भतीजे अजित पवार को महाराष्ट्र की कमान। अभी सबकुछ अधर में लटका हुआ है। विपक्ष की भी नजर एनसीपी में हो रही सियासी हलचल पर है। अगर एनसीपी अपनी नीति में परिवर्तन करता है तो विपक्ष को लोकसभा चुनाव से पहले धक्का लग सकता है। शिवसेना तथा कांग्रेस का कहना है कि यह एनसीपी का आंतरिक मामला है, ङ्क्षकतु एनसीपी महाविकास अघाड़ी गठबंधन के साथ बना रहेगा।
शरद पवार महाराष्ट्र के नहीं बल्कि देश के बड़े नेताओं में शूमार हैं जो कोई भी फैसला अचानक नहीं करते हैं। महज 27 साल की उम्र में शरद पवार विधायक बन गए थे। अपने 50 वर्ष के सियासी सफर के दौरान वे तीन बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे तथा मनमोहन ङ्क्षसह की सरकार में 2004 से 2014 तक कैबिनेट मंत्री रहे। वर्ष 1967 से 1990 तक वे महाराष्ट्र के बरामती सीट पर काबिज रहे, जो सीट अभी उनके भतीजे अजित पवार के पास है। उनकी बेटी सुप्रिया सुले 2009 से बरामती की सांसद हैं। आपातकाल के दौरान शरद पवार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से बगावत कर कांग्रेस छोड़ दी थी। 1978 में जनता पार्टी के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बनाई तथा मुख्यमंत्री बने। लेकिन 1980 में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी सरकार बर्खास्त कर दी गई। 1983 में शरद पवार ने कांग्रेस पार्टी सोशलिस्ट का गठन किया।
1985 में विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को 54 सीटों पर जीत मिली। 1987 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद वे उनके संपर्क में आए तथा 1988 में शंकरराव चव्हान की जगह उन्हें सीएम की जिम्मेदारी मिली। राजनीति के माहिर खिलाड़ी शरद पवार ने 1990 में बहुमत से कम संख्या होने के बावजूद निर्दलीयों के समर्थन से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन गए। 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद नारायण दत्त तिवारी, पीवी नरङ्क्षसह राव के साथ शरद पवार भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे, किंतु बाजी नरसिहं राव ने मार ली। 1999 में सोनिया गांधी से मतभेद के बाद उन्होंने पीए सांगमा एवं तारिक अनवर के साथ मिलकर नई पार्टी का गठन किया। पवार का जीवन केवल राजनीति तक ही सीमित नहीं था। वर्ष 2005 से 2008 तक बीसीसीआई के चेयरमैन रहे तथा 2010 में आईसीसी के अध्यक्ष बने। क्रिकेट से भी शरद पवार का नजदीकी संबंध रहा है। देश की राजनीति पर शरद पवार का काफी प्रभाव है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्षी एकता के लिए चल रहे मुहिम में पवार का काफी योगदान है। पवार के अंतिम फैसले के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि एनसीपी का अगला कदम क्या होगा?