बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी दलों को गोलबंद करने के मिशन पर निकल चुके हैं। उनके साथ बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव भी साथ-साथ चल रहे हैं। नीतीश कुमार ने 24 अप्रैल को कोलकाता पहुंचकर तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी के साथ विपक्षी एकता के मुद्दे सर विस्तार से चर्चा की। दोनों नेताओं ने बैठक के बाद कहा कि विपक्षी एकता के मुद्दे पर सहमति बनी है। हालांकि कांग्रेस तथा टीएमसी के बीच चल रही खटपट जगजाहिर है। नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव के साथ समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ भी विपक्षी एकता के मुद्दे पर चर्चा की। दोनों पाॢटयों का मत है कि अगर विपक्ष मिलकर चुनाव लड़े तो भाजपा को करारी शिकस्त दे सकता है। उम्मीदवारी के मुद्दे तथा गठबंधन पर विस्तार से चर्चा हुई।

इससे पहले नीतीश कुमार ने 12 अप्रैल को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी तथा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ दिल्ली में विशेष रूप से चर्चा की। नीतीश कुमार का मत है कि कोई भी विपक्षी गठबंधन कांग्रेस के बिना अधूरा रहेगा। उन्होंने कांग्रेस से आग्रह किया कि वे आगे बढ़कर विपक्षी एकता के लिए पहल करें। इससे पहले नीतीश ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरङ्क्षवद केजरीवाल, इनेलो के प्रमुख एवं पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला तथा माकपा के महासचिव सीताराम येचूरी से भी मुलाकात की थी। कई विपक्षी नेताओं का मत है कि मोदी सरकार के तानाशाही रवैये से लोकतंत्र खतरे में है। सीबीआई और ईडी के शिकंजे में कई विपक्षी दल के नेता फंसे हुए हैं। विपक्षी नेता सीबीआई और ईडी का विरोध करने के लिए एक मंच पर आते दिख रहे हैं। सीबीआई और ईडी का मुद्दा विपक्षी एकता के लिए एक मुद्दा बन सकता है।

नीतीश कुमार जहां भी जा रहे हैं, उनका कहना है कि वे वर्ष 2024 में प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार नहीं हैं, बल्कि वे विपक्ष को एकजुट करना चाहते हैं। नीतीश कुमार सहित कुछ विपक्षी नेताओं का मानना है कि विपक्षी राजनीतिक दलों को अड़ियल रुख नहीं अपनाते हुए न्यूनतम मुद्दे पर आगे आना चाहिए। कांग्रेस दक्षिण भारत के क्षेत्रीय पाॢटयों को अपने पक्ष में गोलबंद करने में लगी हुई है। कुछ क्षेत्रीय पाॢटयां कांग्रेस के साथ गठबंधन में भी हैं। अगर और क्षेत्रीय पार्टी साथ में आ जाती है तो कांग्रेस की स्थिति और मजबूत होगी। नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव उत्तर भारत के क्षेत्रीय पाॢटयों को इका करने में लगे हुए हैं। इसी पहल के तहत नीतीश की तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, इनेलो आदि क्षेत्रीय पाॢटयों के साथ मुलाकात हुई है। जब से बिहार में भाजपा और जनता दल (यू) का तलाक हुआ है उसके बाद से ही नीतीश काफी आक्रामक नजर आ रहे हैं।

भाजपा की तरफ से भी नीतीश पर तीखे हमले किए जा रहे हैं। नीतीश की महाराष्ट्र के शिवसेना (उद्धव गुट) के साथ मुलाकात भी हो चुकी है। सभी विपक्षी दलों का मानना है कि एकजुट हुए बिना मोदी को परास्त करना मुश्किल है। लेकिन इस क्षेत्र में सबसे बड़ी बाधा यह है कि कुछ क्षेत्रीय दल नहीं चाहते हैं कि इस गंबंधन में कांग्रेस का वर्चस्व हो। कुछ क्षेत्रीय दलों के नेता सार्वजनिक रूप से राहुल गांधी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने से इनकार भी कर चुके हैं। नीतीश का फार्मूला है कि जिस राज्य में जिस पार्टी का दबदबा हो उसको वहां प्रमुखता दी जाए। उसी के नेतृत्व में चुनाव भी लड़ा जाए। इसके साथ-साथ वहां की दूसरी पाॢटयों को भी प्रतिनिधित्व मिले। विपक्ष का मानना है कि चुनाव से पहले अगर प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वमान्य उम्मीदवार का चयन होगा तो उससे विपक्ष बिखर सकता है। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का चुनाव लोकसभा चुनाव के बाद हो। दूसरी तरफ भाजपा भी विपक्ष के इस मूहिम को धराशायी करने के लिए कमर कस चुकी है। अब देखना है कि नीतीश अपने मकसद में कितना कामयाब होंगे, क्योंकि बिहार में ही उनको भाजपा से कड़ी चुनौती मिल रही है।