चीन ने 3 अप्रैल को अरुणाचल प्रदेश की 11 जगहों के नाम बदल कर यह साबित कर दिया है कि वह कभी भी विश्वास योग्य नहीं है। चीन के नागरिक मंत्रालय ने अरुणाचल प्रदेश के पांच पहाड़ी क्षेत्रों, दो आवासीय इलाकों, दो नदियों एवं दो अन्य क्षेत्रों के नाम तिब्बती, चीनी एवं पिनयिन भाषा में बदल कर अपना हिस्सा जताने की कोशिश की है। यह कोई नई बात नहीं है। डोकलाम में भारत और चीन के बीच चले लंबे तनाव के बाद तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा ने अरुणाचल का दौरा किया था। उस वक्त भी चीन ने अरुणाचल के 6 क्षेत्रों के नाम चीनी एवं तिब्बती भाषा में जारी कर भारत को झटका देने का प्रयास किया था। उसके बाद 30 दिसंबर 2021 को चीन ने फिर अरुणाचल के 15 स्थानों का नामकरण अपनी भाषा में किया। चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा मानता है।

वास्तविकता यह है कि जिस तिब्बत को चीन अपना हिस्सा मानता है उस पर ड्रैगन ने 1950 में जबर्दस्ती कब्जा किया है। चीनी अत्याचार से तंग आकर तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा 1959 में तिब्बत से भाग कर अरुणाचल पहुंचे थे। उसके बाद से ही भारत और चीन के बीच तनाव लगातार जारी है। चीन भारत की भूमि को धीरे-धीरे कब्जाने की नीति पर चल रहा है। नरेन्द्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद चीन की दादागिरी पर अंकुश लगाने का प्रयास शुरू हुआ है। वर्ष 2017 में हुई डोकलाम की घटना के बाद भारत ने अपना फोकस पाकिस्तान से हटाकर चीन की ओर कर दिया है। पिछले 25 एवं 26 मार्च को अरुणाचल प्रदेश में जी-20 की बैठक हुई, जिसमें चीन के प्रतिनिधियों ने कड़ा विरोध किये बिना बैठक से दूरी बना ली थी। ऐसा लगता है कि 11 क्षेत्रों का चीनी भाषा में नामकरण डै्रगन की जवाबी कूटनीतिक कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है।

भारत ने इस नामकरण पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है और आगे भी रहेगा। नामकरण से कुछ होने वाला नहीं है। वर्ष 2020 से ही चीन से सटी 3488 किलोमीटर लंबी सीमा पर लगातार तनाव बना हुआ है। तवांग सेक्टर में भारत और चीनी फौज के बीच जबर्दस्त टकराव देखने को मिला था। अमरीकी कांग्रेस की सीनेट ने पहली बार एक प्रस्ताव पारित कर अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा माना है। दोनों प्रमुख पार्टियों के सांसदों द्वारा अरुणाचल पर लाए गए प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भारत और चीन के बीच मेकमोहन लाइन को वैध माना जाए। अमरीका द्वारा इस पर पहली बार ठोस समर्थन मिलने से भी चीन बौखलाया हुआ है। भारत स्थित चीनी राजदूत तथा वहां के विदेश मंत्रालय का कहना है कि भारत के साथ स्थिति स्थिर है, जबकि दूसरी तरफ चीन आक्रामकता दिखाने से बाज नहीं आ रहा है। यही कारण है कि भारत चीन से सटे एलएसी पर अपनी सामरिक स्थिति लगातार मजबूत करता जा रहा है।

सड़कों से लेकर ग्रीनफील्ड का विकास तेजी से हो रहा है। अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे का निर्माण वर्ष 2022 से शुरू हो चुका है। 2000 किलोमीटर लंबा यह हाईवे भूटान के पास से लेकर म्यामां सीमा के पास अरुणाचल के विजयनगर तक जाएगा। 1790 मीटर लंबे सेला टनल का निर्माण कार्य भी जुलाई 2023 तक पूरा होने का अनुमान है। अरुणाचल सीमा के पास बुनियादी ढांचा मजबूत होने से युद्ध की स्थिति में सैनिकों का सीमा तक पहुंचना आसान हो जाएगा। कुल मिलाकर भारत को चीन की चालबाजियों से सतर्क रहते हुए सामरिक, आर्थिक एवं व्यापारिक मोर्चे पर हमेशा तैयार रहना पड़ेगा।