डॉ. हिमंत विश्वशर्मा

भारत में 2015 से 26 नवंबर को प्रतिवर्ष संविधान दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। भारत की संविधान सभा ने 1949 के इसी तारीख को भारतीय संविधान को ग्रहण किया था। इसलिए इस दिन की याद में तथा देशवासियों को संविधान की गरिमा को स्मरण करने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने 2015 से सरकारी कार्यक्रम के रूप में इसे मनाने का निर्णय लिया था। स्वतंत्रता के बाद भारत को विश्व के सबसे बड़े गणतांत्रिक देश के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए भारतीय नेताओं ने भरसक प्रयास किए थे। भारतीय संविधान के प्रमुख प्रणेता डॉ. बीआर अंबेडकर ने  टिप्पणी की थी - सामाजिक गणतंत्र के बिना राजनीतिक गणतंत्र संभव नहीं है। सामाजिक गणतंत्र में स्वतंत्रता,समता तथा भाईचारे को जीवन का मूलमंत्र माना जाता है। भारत का प्राचीन इतिहास भी गणतांत्रिक मूल्यबोध का गवाह है, परंतु भारत का यह गणतांत्रिक मूल्यबोध दो बार धूलधूसरित हुआ था -पहली बार स्वतंत्रता से पहले अंग्रेज सरकार की ओर से और दूसरी बार स्वतंत्र भारत में इंदिरा गांधी सरकार के शासनकाल में। इंदिरा गांधी के शासन काल में 1975 के 25 जून की मध्यरात्रि को देश में आपातकालीन स्थिति की घोषणा की गई थी। उक्त घटना के 46 वर्ष बाद 2021 में गणतंत्र की हत्या के उस प्रयास को एक बुरे सपने की तरह हम फिर से याद कर रहे हैं। विश्व में कई अधिनायकवादी नेताओं ने अपने कुशासन को सुरक्षित रखने के लिए गणतांत्रिक मूल्यबोध में विश्वास रखने वाले विपक्ष के राजनेताओं को बंदी बनाकर उनकी आवाज को  दबाने का प्रयास किया था,परंतु परंपरागत रूप से गणतांत्रिक मूल्यबोध में विश्वास रखने वाले देश भारत में भी जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विपक्ष के सभी नेताओं की आवाज दबाने का प्रयास किया तो सब भौंचक्के रह गए। जिस कांग्रेस ने 1947 में भारत को अंग्रेजों के शासन से मुक्ति दिलाकर देश में गणतंत्र की प्रतिष्ठा की थी, उसी कांग्रेस की इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री के रुप में सरकारी क्षमता का अपव्यवहार कर लगभग सभी विपक्षी नेताओं को जेल में बंद कर दिया था। राष्ट्रीय सुरक्षा के बहाने इंदिरा गांधी ने विपक्ष के नेताओं के खिलाफ आक्रोश और प्रतिशोधमूलक आचरण अपनाया था। इसका मूल एक गंभीर न्यायिक और राजनीतिक समस्या के कारण उत्पन्न उनकी निराशा और शंका की भावना थी। 1971 के आम चुनाव के बाद इंदिरा गांधी के चुनावी प्रतिद्वंदी राजनारायण ने इलाहाबाद हाइकोर्ट में एक मुकद्दमा दायर किया था और न्यायाधीश जगमोहन लाल सिंहा ने उस मामले की जांच की थी। 1975 के 12 जून को इस मुकद्दमे की सुनवाई के दौरान उन्होंने इंदिरा गांधी को दो आरोप में दोषी करार दिया था। इंदिरा गांधी के खिलाफ पहली शिकायत पर प्रधानमंत्री कार्यालय में कार्यरत विशेष अधिकारी यशपाल कपूर को चुनावी कार्य में लगाने के आरोप में इंदिरा गांधी को दोषी करार दिया था। इंदिरा गांधी के खिलाफ दूसरी शिकायत में उत्तर प्रदेश के सरकारी अधिकारियों की ओर से इंदिरा गांधी के लिए चुनावी प्रचार हेतु मंच तैयार करने तथा चुनावी प्रचार के दौरान सरकारी माइक और बिजली का व्यवहार करने का मुद्दा था। साथ ही न्यायाधीश सिंहा ने इसमें भी इंदिरा गांधी को दोषी करार दिया था। इन दोनों मामलों में दोषी करार देते हुए इंदिरा गांधी को चयनित प्रतिनिधि के रूप में अयोग्य घोषित किया गया और छह वर्षों के लिए उन पर चुनाव के माध्यम से कोई भी पद ग्रहण करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। चुनाव में जीत हासिल करने के लिए सरकारी अधिकारियों का  उपयोग करना एक बड़ा अपराध है। कई मंत्री, सांसद तथा विधानसभा के सदस्य इस प्रकार की शिकायत के कारण अयोग्य घोषित हो चुके हैं। आंध्रप्रदेश  से जीतकर आए इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल के सदस्य चेन्ना रेड्डी के खिलाफ चुनावी भ्रष्टाचार की शिकायत के कारण उन्हें पदत्याग करने को बाध्य होना रड़ा था,परंतु जब अपनी बारी आई तब इंदिरा गांधी ने न्यायालय की राय मानने से इनकार कर दिया। विपक्षी दलों ने इंदिरा गांधी के ऐसे कार्य के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया,परंतु गांधी ने उन नेताओं के खिलाफ गणतंत्र के खिलाफ कार्य करने का आरोप लगाया।  25 जून को एक सार्वजनिक सभा में विपक्ष के नेता जयप्रकाश नारायण ने इलाहाबाद हाइकोर्ट की राय के मुताबिक इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग की थी। उसके बाद मध्यरात्रि को दिल्ली स्थित गांधी पीस फाउंडेशन के मुख्य कार्यालय में जयप्रकाश नारायण को पुलिस ने नींद से जगाकर गिरफ्तार कर लिया। गांधी फाउंडेशन के किसी सदस्य ने जयप्रकाश नारायण की गिरफ्तारी की खबर देने के लिए पत्रकारों को फोन किया था, परंतु उन्हें पता नहीं था कि सभी समाचार पत्रों के प्रतिष्ठानों में बिजली की आपूर्ति बंद कर दी गई थी, सिर्फ दिल्ली के ही नहीं, कई राज्यों से प्रकाशित प्रमुख समाचार पत्रों के प्रकाशन भी बंद कर दिए गए थे। क्षमता  की बागडोर अपने हाथ में रखने के लिए इंदिरा गांधी ने अपने पिता के सहयोगी रहे प्रसिद्ध गांधीवादी नेता जयप्रकाश नारायण को भी जेल भेजने में तनिक भी देर नहीं की। अपनी गिरफ्तारी के बाद जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा था- विनाशकाले विपरीत बुद्धि। जयप्रकाश नारायण के बाद मोरारजी देसाई को भी गिरफ्तार करने के लिए पुलिस आई। अहिंसा की नीति पर विश्वास रखने वाला मोरारजी ने खुद गिरफ्तारी को वरण किया। गिरफ्तारी से दो दिनों पहले इटली के एक पत्रकार ने उनकी गिरफ्तारी की संभावना पर उनसे बात की थी तो उन्होंने कहा था  कि इंदिरा कभी ऐसा नहीं कर सकतीं। अगर ऐसा करना पड़ा तो वह पहले आत्महत्या करेंगी,परंतु मोरारजी की ऐसी आस्था को भी पैरों से कुचल कर इंदिरा गांधी ने उन्हें गिरफ्तार करवाया। गिरफ्तारी के बाद इंदिरा गांधी के संबंध में मोरारजी ने कहा था- ईश्वर जब किसी का विनाश चाहता है तो पहले उसे पागल कर देता है।  विपक्ष के नेताओं तथा समाचार पत्रों की आवाज दबाने के लिए इंदिरा गांधी पहले से ही किसी मौके की तलाश में थीं। प्रधानमंत्री कार्यालय से विभिन्न राज्यों के नेताओं की गिरफ्तारी के लिए निर्देश भेजे गए थे। गिरफ्तार होने वाले नेताओं की तालिका बनाने में रिसर्स एंड एनालाइटिकर विंग (आईएडब्ल्यू) का भी उपयोग किया गया था। किस नेता को किस कानून के तहत गिरफ्तार किया जाएगा उसे भी तय कर लिया गया था। इसी प्रकार जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देशाई के बाद अशोक मेहता तथा जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृृष्ण आडवाणी को भी गिरफ्तार किया गया। 26 जून की सुबह तक तालिका के अनुसार 676 नेताओं को जेल भेज दिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस)पर प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था भी पहले ही कर ली गई थी। पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने एक ऑर्डिनेंस के जरिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव दिया था। जनसंघ की ओर से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका पांचजन्य, दैनिक समाचार पत्र तरुण भारत और मासिक हिंदी पत्रिका राष्ट्रधर्म के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सर्च वारंट के बिना पुलिस ने कार्यालय से पत्रकारों को बाहर कर दिया और दरवाजे पर ताला लगा दिया। सरकार के डर से कोई वकील उनकी मदद करने को तैयार नहीं था, जो आए थे उन्हें भी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार करके जेल में बंद कर दिया गया। असम में भी तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इंदिरा विरोधी नेता देवेश्वर शर्मा, रेणुका देवी बरकटकी, खगेन गोगोई, पूर्णनारायण सिंह, दुलाल बरुवा, गोलाप बरबोरा, निबारण बोरा, लक्षेश्वर गोहाईं,रमणी बर्मन, भुवनेश्वर बर्मन और इंद्रेश्वर गोस्वामी आदि कई नेताओं को गिरफ्तार करके जेल में बंद कर दिया था। इसी तरह आगे भी भारत में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में गणतंत्र को कुचल दिया गया था। प्रतिवर्ष 25 जून के दिन हम भारतीय गणतंत्र के इस काले अध्याय को याद करते हैं। कांग्रेस ने अपने सभी विपक्ष दलों को नष्ट कर के, समाचार पत्रों  की आवाज बंद करके गणतंत्र के चौथे स्तंभ के प्रति जो  समस्या उत्पन्न की थी, उसकी पुनरावृत्ति फिर न हो, इसी कामना तथा भारतीय संविधान और गणतंत्र के प्रति हमेशा समर्पित रहने का 25 जून के दिन हमें संकल्प लेना होगा।