केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री ने अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस के अवसर पर अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया, साथ ही वानिकी हस्तक्षेपों के माध्यम से मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण की समस्या का समाधान करने हेतु राष्ट्रीय कार्ययोजना का अनावरण किया। अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट के जरिए हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और दिल्ली राज्यों को शामिल करते हुए अरावली पर्वत शृंखला के चारों ओर 1,400 किमी लंबी और 5 किमी। चौड़ी ग्रीन बेल्ट बफर बनाने की एक महत्वाकांक्षी योजना है। पहले चरण में 75 जल निकायों का कायाकल्प किया जाएगा, जिसकी शुरुआत अरावली परिदृश्य के प्रत्येक जिले में पांच जल निकायों से होगी।
यह गुडग़ांव, फरीदाबाद, भिवानी, महेंद्रगढ़ और हरियाणा के रेवाड़ी जिलों में निम्नीकृत भूमि को शामिल करेगा। यह योजना अफ्रीका की ग्रेट ग्रीन वॉल परियोजना से प्रेरित है, जो सेनेगल (पश्चिम) से लेकर जिबूती (पूर्व) तक विस्तृत है, यह वर्ष 2007 में लागू हुई थी। भारत की ग्रीन वॉल परियोजना का व्यापक उद्देश्य भूमि क्षरण की बढ़ती दरों और थार रेगिस्तान के पूर्व की ओर विस्तार को नियंत्रित करना है। पोरबंदर से पानीपत तक के लिये हरित पट्टी की योजना बनाई जा रही है, जो अरावली पर्वत शृंखला में वनीकरण के माध्यम से बंजर भूमि को पुनस्र्थापित करने में सहायता करेगी। यह पश्चिमी भारत और पाकिस्तान के रेगिस्तान से आने वाली धूल के लिये एक अवरोधक के रूप में भी काम करेगा। इसका उद्देश्य पेड़-पौधे लगाकर अरावली शृंखला की जैवविविधता और पारिस्थितिकी तंत्र को विकसित करना है, जो कार्बन पृथक्करण में मदद करेगा, वन्यजीवों के लिये आवास प्रदान करेगा और जल की गुणवत्ता एवं मात्रा में सुधार करेगा।
वनीकरण, कृषि-वानिकी और जल संरक्षण गतिविधियों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी से सतत विकास को बढ़ावा दे सकती है। इसके अतिरिक्त यह आय और रोडग़ार के अवसर पैदा करने, खाद्य सुरक्षा में सुधार करने तथा सामाजिक लाभ प्रदान करने में मदद करेगा। अरावली को 26 मिलियन हेक्टेयर (एमएचए) भूमि को बहाल करने के भारत के लक्ष्य के तहत हरियाली के लिये उठाए जाने वाले प्रमुख अवक्रमित क्षेत्रों में से एक के रूप में पहचाना गया है। इसरो की वर्ष 2016 की एक रिपोर्ट ने भी संकेत दिया था कि दिल्ली, गुजरात और राजस्थान पहले ही अपनी 50 प्रतिशत से अधिक भूमि को निम्नीकृत कर चुके हैं।
अरावली, पृथ्वी पर सबसे पुराना वलित पर्वत है। यह गुजरात से दिल्ली (राजस्थान और हरियाणा के माध्यम से) तक 800 किमी से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है। अरावली शृंखला की सबसे ऊंची चोटी माउंट आबू पर गुरु पीक है। अरावली का उत्तर-पश्चिमी भारत और उससे आगे की जलवायु पर प्रभाव है। मानसून के दौरान पर्वत शृंखला धीरे-धीरे मानसूनी बादलों को शिमला और नैनीताल की तरफ पूर्व की ओर ले जाती है, इस प्रकार यह उप-हिमालयी नदियों का पोषण करने और उत्तर भारतीय मैदानों को उर्वरता प्रदान करने में मदद करती है। सर्दियों के महीनों में यह उपजाऊ जलोढ़ नदी घाटियों (पार-सिंधु और गंगा) को मध्य एशिया से आने वाली ठंडी पछुआ पवनों के हमले से रक्षा करती है।