मानहानि के एक मामले में सूरत की एक अदालत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को दोषी करार दिया है। मामला करीब चार साल पुराना है। 2019 में लोकसभा चुनावों से पहले एक चुनावी भाषण के दौरान कर्नाटक के कोलार में गांधी ने कहा था कि सारे चोरों के नाम मोदी ही क्यों होते हैं? वो घोटाले के आरोपों का सामना कर रहे उद्योगपति ललित मोदी और नीरव मोदी की बात कर रहे थे। उनके इसी बयान पर गुजरात में भाजपा के विधायक पूर्णेश मोदी ने उनके खिलाफ पूरे मोदी समुदाय को बदनाम करने का आरोप लगाते हुए एक मुकदमा दर्ज कर दिया। सुनवाई करीब चार सालों तक चली और अब जाकर अदालत ने गांधी को दोषी पाया है। उन्हें दो साल कारावास की सजा भी सुनाई गई है।

हालांकि अदालत ने फैसला सुनाने के तुरंत बाद सजा को 30 दिनों के लिए रोक दिया ताकि गांधी इस अवधि में सजा के खिलाफ अपील कर सकें। मानहानि का कानून अंग्रेजों के जमाने का एक कानून है जिसके तहत दोषी पाए जाने पर दो साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है। आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस कानून की कोई जगह नहीं है और इसे हटा देना चाहिए। हालांकि मानहानि विपक्ष के नेताओं को परेशान करने के लिए सरकार के पास एकलौता जरिया नहीं है। भ्रष्टाचार के आरोप और अन्य आरोपों के आधार पर केंद्रीय एजेंसियों का विपक्ष के नेताओं को ही निशाना बनाना इसी सिलसिले की एक कड़ी है। इसके अलावा और भी कई तरीके हैं।

उल्लेखनीय है कि भारत के जन प्रतिनिधित्व कानून और सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2013 में की गई विवेचना के मुताबिक लोकसभा या किसी भी विधानसभा के सदस्य की सदस्यता रद्द होने के लिए उसका दोषी पाया जाना और कम से कम दो साल की जेल की सजा पाना काफी है। कानून के मुताबिक ऐसे में उसकी सदस्यता अपने आप रद्द हो जाती है। लोकसभा या विधानसभा को सदस्य की दोषसिद्धि की जानकारी मिलने और फिर सदन द्वारा चुनाव आयोग को उस सदस्य की सीट रिक्त हो जाने की सूचना देने की औपचारिक कार्रवाई पूरा होने में समय लग सकता है। इस बीच अगर किसी ऊपरी अदालत से अपनी दोषसिद्धि पर रोक हासिल कर लें तो उनकी सदस्यता बच सकती है। 

दिलचस्प है कि दोषसिद्धि के बाद तुरंत सदस्यता रद्द होने से बचाने के लिए एक अध्यादेश यूपीए सरकार 2013 में लेकर आई थी, लेकिन उस समय खुद राहुल गांधी ने एक प्रेस वार्ता में उस अध्यादेश की एक प्रति को फाड़ दिया था। उसके बाद वो अध्यादेश वापस ले लिया गया। यानी मौजूदा प्रावधानों के तहत अगर गांधी जल्द ही अपनी दोषसिद्धि पर रोक हासिल न कर लें तो ना सिर्फ  उनकी लोकसभा की सदस्यता जाएगी बल्कि वो आठ सालों के लिए चुनावी राजनीति से बाहर हो जाएंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि जनप्रतिनिधि कानून के तहत दोषी पाए गए सांसद या विधायक को सजा पूरी करने के बाद छह सालों तक चुनाव लड़ने की भी अनुमति नहीं मिलती है। यह गांधी और कांग्रेस पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती है।

फिलहाल कांग्रेस पार्टी इस चुनौती का सामना करने के लिए कई रणनीतियों पर काम कर रही है। सबसे पहले तो वो पूरे विपक्ष को इस मुद्दे पर एकजुट करने की कोशिश कर रही है। इसके अलावा कांग्रेस ने इस पूरे मामले में पूरी न्यायिक प्रक्रिया के ठीक से पालन नहीं किए जाने का भी आरोप लगाया है। उल्लेखनीय है कि राहुल गांधी के खिलाफ इसके पहले भी मानहानि के मुकदमे दर्ज किए गए हैं। महाराष्ट्र के भिवंडी में उनके खिलाफ 2014 से मानहानि का एक मुकदमा चल रहा है जिसे आरएसएस के एक स्थानीय कार्यकर्ता ने दर्ज करवाया था। मामला राहुल गांधी के एक बयान से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि आरएसएस के लोगों ने महात्मा गांधी की हत्या की थी। इसके अलावा उनके खिलाफ असम, झारखंड और महाराष्ट्र में एक और मानहानि का मुकदमा चल रहा है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि राजनेताओं को ऐसी भाषा नहीं बोलनी चाहिए जिससे किसी समाज की भावना प्रभावित हो।