महाभारत काल और उसके बाद के कालखंड की कथाओं में जिक्र है कि कलकत्ता से कामरूप देवी का क्षेत्र आरंभ हो जाता है। इसी क्षेत्र के बीच में स्थित किशनगंज जिले के ठाकुरगंज में भी देवी के भव्य मंदिर निर्मित हैं। जिले के ठाकुरगंज में देवी विराजमान हुई हैं। यूं तो कटिहार की पुरानी काली बाड़ी, अररिया स्थित खडगेश्वरी काली, किशनगंज के पास पांजिपाड़ा हाइवे में स्थित काली मंदिर तथा ओद्रा घाट और जलपाईगुड़ी, बंगाल की डकैत काली बाड़ी इस क्षेत्र में देवी के प्रसिद्ध मंदिर है। जहां एक ओर किशनगंज स्थित बूढ़ी काली मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है वहीं दूसरी ओर ठाकुरगंज स्थित कलकतिया दक्षिणा काली मंदिर भी अपने आप में अनूठा हैं।
ठाकुरगंज मुख्य बाजार से चंद मिनटों की दूरी पर जैसे साक्षात देवी आदिशक्ति के कलकत्ता स्थित कालीघाट की प्रतिकृति उतर आई हो। बंगाल के कालीघाट शैली में ही मंदिर का निर्माण हुआ है। मुख्यद्वार, गर्भगृह, गुम्बद, यज्ञशाला आदि हिस्सों को देखकर कालीघाट शक्तिपीठ का सा आभास होता है। मंदिर के संरक्षक कलकतिया फार्म परिवार के शिव कुमार सोनकर का कहना है कि मां की पूजा तो यहां विगत 40 वर्षों से चल रही है, मंदिर भी मां की कृपा से ही निर्मित हो पाया है। मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा पूर्ण वैदिक विधान के साथ स्वयं कालीघाट मंदिर के पुरोहितों द्वारा संपन्न हुई।
बनारस से गंगा जल मंगवाया गया तो वहां के राजा के दरवाजे के पास की मिट्टी भी मंगवाई गई। फूल, कपूर, पूजा के बर्तन आदि कलकत्ता से लाए गए। सभी तैयारियों में जरूरी विधि-विधान का पूर्ण रूप से पालन किया गया था। देवी यहां विराजमान होते ही अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में दर्शन देने लगी। दूर-देश से श्रद्धालु आने लगे। भक्तों को मंदिर में चमत्कारों का भी अनुभव होने लगा। कभी देवी की प्रतिमा के हाथों से पुष्प सीधे प्रसाद में गिर पड़ते है, तो कभी नाग आदि सर्प भी मंदिर प्रांगण में पाए जाते हैं। भक्तों को उनकी परेशानियों का उत्तर मंदिर में ही मिल जाता है जैसे स्वयं देवी उन्हें सलाह दे र