शोधकर्ता ने तितलियों से प्रेरणा लेकर पहला पर्यावरण अनुकूल, बड़े पैमाने पर अनेक रंगों का विकल्प तैयार किया है, जो ऊर्जा को बचाने के प्रयासों में अहम भूमिका निभा सकता है। साथ ही जलवायु में बदलाव करने वाले ग्लोबल वार्मिंग पर भी लगाम लगाने में मदद कर सकता है। यह कारनामा यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट्रल फ्लोरिडा के शोधकर्ता प्रोफेसर देबाशीष चंदा ने किया है। शोधकर्ता के मुताबिक, प्राकृतिक दुनिया में रंगों और इनकी सीमा व्यापक है,  रंग-बिरंगे फूल, पक्षियों और तितलियों से लेकर मछली और सेफालोपोडा जैसे पानी के नीचे रहने वाले जीवों तक में अनोखे रंग होते हैं।

संरचनात्मक रंग कई अत्यंत चटकीले प्रजातियों में शुरुआती  रंगों के बनने के तंत्र के रूप में कार्य करता है, जहां आम तौर पर दो बिना रंग वाली सामग्रियों की व्यवस्था सभी रंगों का उत्पादन करती है। दूसरी ओर, मानव निर्मित रंगों के साथ, प्रत्येक रंग के लिए नए अणुओं की आवश्यकता होती है। इस तरह की जैवविक चीजों से प्रेरणा के आधार पर, शोध टीम ने एक प्लास्मोनिक पेंट का आविष्कार किया, जो रंग बनाने के लिए पिग्मेंट या वर्णक के बजाय रंगहीन सामग्री एल्यूमीनियम और एल्यूमीनियम ऑक्साइड की नैनोस्केल संरचनात्मक व्यवस्था का उपयोग करता है। जबकि वर्णक रंजक वर्णक सामग्री के इलेक्ट्रॉनिक गुण के आधार पर प्रकाश अवशोषण को नियंत्रित करते हैं, इसलिए प्रत्येक रंग को एक नए अणु की आवश्यकता होती है। 

ऐसे संरचनात्मक रंग पर्यावरण के अनुकूल होते हैं क्योंकि वे केवल धातुओं और आक्साइड का उपयोग करते हैं, वर्तमान वर्णक आधारित रंगों के विपरीत जो कृत्रिम रूप से बने हुए अणुओं का उपयोग करते हैं। प्रोफेसर चंदा कहते हैं, हमें कुछ अलग करने की जरूरत है, जैसे बिना विषाक्तता, कूलिंग इफेक्ट, अल्ट्रालाइट वेट, जो अन्य पारंपरिक पेंट नहीं कर सकते। यह शोध साइंस एडवांस नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।