सूभारतीय संस्कृति के धार्मिक व पौराणिक मान्यता के अनुसार मां श्रीशीतला देवी की महिमा अपरंपार है। होली के सात दिन बाद चैत्र माह के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को श्रीशीतला अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे बसौड़ा (बसिऔरा) के नाम से भी जाना जाता है। इस बार 14 मार्च, मंगलवार को मनाया जाएगा। हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन श्रीशीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि 13 मार्च, सोमवार को रात्रि 9 बजकर 28 मिनट से लगेगी, जो कि अगले दिन 14 मार्च, मंगलवार को रात्रि 8 बजकर 23 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि की मान्यता के अनुसार 14 मार्च, मंगलवार को श्रीशीतला अष्टमी का व्रत रखा जाएगा।

पूजा का विधान : व्रतकर्ता को प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। अपने इष्ट देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के पश्चात् श्रीशीतला माता के समक्ष हाथों में फूल, अक्षत और एक सिक्का लेकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। शीतला अष्टमी के दिन मां शीतला को बासी भोजन का भोग लगाने का विधान है। शास्त्रों के अनुसार, सप्तमी तिथि के दिन भोजन बनाने की जगह को साफ व स्वच्छ कर गंगा जल छिड़क लें। मां शीतला के भोग की सामग्री सप्तमी तिथि की शाम को बनाया जाता है। प्रेम, श्रद्धा के साथ भोग स्वरूप चावल-गुड़ या फिर चावल और गन्ने के रस को मिलाकर खीर तथा मीठी रोटी बनाया जाता है।

श्रीशीतला सप्तमी पर मां दुर्गा के स्वरूप शीतला माता की पूजा की जाती है। मां शीतला को फूल, माला, सिंदूर, सोलह शृंगार की सामग्री आदि अर्पित करने के साथ ही उन्हें शुद्ध और सात्विक बासी या ठंडे भोजन का भोग लगाकर जल अर्पित करें। फिर घी का दीपक और धूप जलाकर शीतला स्त्रोत का पाठ करें।  इस व्रत को करने से आरोग्य का वरदान मिलता है। माता शीतला आपके बच्चों की गंभीर बीमारियों एवं बुरी नजर से रक्षा करती हैं।