यूपी के हाथरस जिले में दो साल पहले एक दलित युवती के साथ गैंगरेप और हत्या के मामले में स्थानीय अदालत ने तीन अभियुक्तों को बरी कर दिया है। स्थानीय अदालत ने एक अभियुक्त को गैर इरादतन हत्या का दोषी ठहराते हुए उसे उम्र कैद की सजा सुनाई है। दोषी संदीप सिंह पर पचास हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। इस मामले में रेप का आरोप साबित नहीं हो सका है। मुख्य अभियुक्त संदीप सिंह को गैर इरादतन हत्या और एससी-एसटी एक्ट के तहत दोषी ठहराया गया है, वहीं, पीड़ित पक्ष कोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं और वह इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करने की तैयारी में है।

अभियुक्तों के वकील का कहना है कि शुरू से ही दिख रहा था कि गैंगरेप के कोई सबूत नहीं हैं और अदालत ने फैसला भी वही सुनाया है। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई गवाह नहीं मिला, जिसके बयान से गैंगरेप की पुष्टि हो। इसमें साजिश थी और यह पूरा केस बनाया गया था जिसका अंत यही होना था।  संदीप भी निर्दोष है, वो भी छूट जाएगा। इसके लिए हम लोग हाई कोर्ट जाएंगे। उल्लेखनीय है कि घटना के समय यह मामला काफी तूल पकड़ा था। इसलिए पुलिस ने सुरक्षा के लिहाज से सुनवाई के दिन कोर्ट में सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए थे, यही नहीं,आस-पास के जिलों में भी सुरक्षा काफी बढ़ा दी गई थी। हाथरस कांड के विरोध में देश के कुछ शहरों में प्रदर्शन भी हुए थे।

उल्लेखनीय है कि14 सितंबर 2020 को हाथरस जिले के चंदपा गांव में एक दलित युवती के साथ गैंगरेप का मामला सामने आया था। युवती के साथ कथित तौर पर गैंगरेप उस वक्त हुआ था जब वो गांव में ही अपने खेत में अपनी मां के साथ घास काटने गई थी। पीड़ित लड़की की जीभ भी काट दी गई थी। पीड़ित लड़की की मां ने उस वक्त बताया था कि जब वो लड़की के पास पहुंची तो वह घायल थी और उसके कपड़े फटे हुए थे। बाद में लड़की की मां और बड़ा भाई उसे मोटरसाइकिल से चंदपा थाने लेकर गए और फिर उसे जिला अस्पताल ले जाया गया था लेकिन वहां से उसे अलीगढ़ मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया। गैंगरेप का आरोप गांव के ही चार युवकों पर लगा था। लड़की ने अलीगढ़ मेडिकल कॉलेज में होश में आने के बाद बयान दिया था जिसके आधार पर उसके भाई ने गांव के ही संदीप ठाकुर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था।

बाद में तीन अन्य लोगों-लवकुश सिंह, रामू सिंह और रवि सिंह को भी अभियुक्त बनाया गया और चारों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया था। इस बीच पीड़ित लड़की की हालत खराब होने पर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां 29 सितंबर को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। लड़की का शव हाथरस लाया गया तो पुलिस वालों ने बिना परिजनों की अनुमति के ही उसी रात शव का अंतिम संस्कार कर दिया था।  परिजनों ने आरोप लगाया था कि यूपी पुलिस ने उन्हें अपनी बेटी का मुंह तक नहीं देखने दिया। पुलिस के इस कृत्य और घटना की वीभत्सता की तस्वीरें और वीडियो वायरल होने लगे तो जगह-जगह विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। मामला बढ़ने पर राज्य सरकार ने एसपी और सीओ समेत पांच पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया था। कई मानवाधिकार संगठनों ने भी राज्य पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए।

मामले की जांच पहले यूपी पुलिस और फिर एसआईटी ने की लेकिन बढ़ते आक्रोश और यूपी पुलिस की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों के बीच 11 अक्तूबर को मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई। घटना के बाद भी पीड़ित परिवार को कई बार धमकियां मिलती रहीं जिसके कारण उन्हें सुरक्षा दी गई। पीड़ित परिवार घटना के बाद से ही हर वक्त सीआरपीएफ की सुरक्षा के साये में रहता है और जहां कहीं भी जाता है तो सुरक्षा के साथ ही जाता है। कुल मिलाकर इस संबंध में जो फैसला आया है, वह पीड़ित परिवार के दुःख को और बढ़ाने वाला है। अदालत की अपनी मजबूरियां होती हैं। समुचित गवाह और कानूनी दांव- पेंच के कारण कभी-कभी दोषियों का दोष साबित नहीं हो पाता है, यह हमारी कानून व्यवस्था की विडंबना है।