भारत में आयोजित होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन के बैनर तले विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में रूस-यूक्रेन युद्ध का मामला छाया रहा। अमरीका सहित पश्चिमी देश इस युद्ध के लिए रूस को घेरना चाहते हैं, जबकि भारत शुरू से ही इस मामले में तटस्थ रुख अपनाये हुए है। रूस और चीन जैसे देश पश्चिमी देशों के खिलाफ खड़े हैं। भारत के लिए इस सम्मेलन को सफल बनाना कूटनीतिक परीक्षा के समान होगी, क्योंकि भारत इस वर्ष जी-20 का अध्यक्ष है। पहले से ही रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर तनातनी का माहौल बना हुआ है। इससे पहले बंगलुरू में जी-20 देशों के वित्त मंत्रियों एवं केंद्रीय बैंकों के गवर्नरों की बैठक के दौरान सदस्य देशों के बीच मतभेद रहा।
फ्रांस ने इस मसौदे में रूस की आलोचना को शामिल नहीं किये जाने के कारण साझा बयान पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। इसको लेकर भारत और फ्रांस के बीच मनमुटाव की खबरें आ रही हैं। भारत का कहना है कि जी-20 शिखर सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, विकास, आतंकवाद एवं प्राकृृतिक आपदा जैसे मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए। रूस-यूक्रेन युद्ध पर चर्चा करने के लिए जी-20 उचित प्लेटफॉर्म नहीं है। अमरीका सहित पश्चिमी देश यूक्रेन को लगातार हथियार देकर रूस को थकाना चाहते हैं। रूस भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। पश्चिमी देश शांति की वार्ता तो करते हैं, किंतु वास्तव में वे अपने निजी स्वार्थ को ही तरजीह दे रहे हैं। इस युद्ध के कारण यूरोप के कई देशों की आर्थिक स्थिति खराब हो गई है तथा महंगाई चरम पर है।
यूक्रेन को समर्थन देने के मुद्दे पर नाटो देशों में भी मतभेद है। हाल ही में भारत यात्रा के दौरान जर्मनी के चांसलर ओलाफ शोल्ज ने यह स्वीकार किया है कि यूक्रेन को उन्नत हथियार देने से युद्ध की चिंगारी और भड़क सकती है। जर्मनी द्वारा यूक्रेन को उन्नत टैंक दिये जाने के बाद जर्मनी में ही विरोध शुरू हो गया है। भारत में अमरीका, रूस, फ्रांस, चीन, जर्मनी, ब्रिटेन सहित लगभग सभी प्रमुख देशों के विदेश मंत्री इकट्ठा हो चुके हैं। 2 मार्च तक सभी विदेश मंत्री साझा मुद्दों को अंतरिम रूप देंगे। देखना है कि विदेश मंत्रियों की बैठक में साझा मुद्दों पर आम सहमति बन पाती है या नहीं। भारत के लिए इस पूरे मामले में अजीबोगरीब स्थिति पैदा हो गई है। सभी पक्षों को संतुष्ट करना भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक चुनौती है। उम्मीद है कि भारत इस मुहिम में सफल होगा।