नेपाल में एक बार फिर राजनीतिक समीकरण बदलता नजर आ रहा है। राष्ट्रपति चुनाव को लेकर नेपाल की दोनों प्रमुख वामपंथी पार्टियों के बीच मतभेद गहराने तथा केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाले सीपीएन-यूएमएल द्वारा पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद सियासी हलचल बढ़ गई है। हालांकि सीपीएन-यूएमएल द्वारा समर्थन वापस लेने से प्रचंड सरकार को कोई खतरा नहीं है। प्रधानमंत्री प्रचंड ने राष्ट्रपति पद के लिए नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार रामचन्द्र पौडेल को समर्थन दिया है।
दूसरी तरफ सीपीएन-यूएमएल ने सुभाष नेमबांग को अपना उम्मीदवार बनाया है। अभी प्रचंड को नेपाली कांग्रेस सहित अन्य सात दलों का समर्थन प्राप्त है। फिलहाल तीन बड़े राजनीतिक दलों के अलग होने से 16 मंत्रालय खाली हुए हैं। प्रचंड अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए अपने नए सहयोगी दलों के नेताओं को मंत्री पद देंगे। पिछले कुछ वर्षों से नेपाल अस्थिर राजनीतिक दौर से गुजर रहा है। दोनों प्रमुख वामपंथी दलों के अलग होने से चीन को करारा झटका लगा है। चीन ने ही नेपाल में भारत का प्रभाव कम करने के लिए अंतिम समय में ओली और प्रचंड को एकजुट किया था। सरकार के गठन के कुछ दिन बाद ही राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के उप-प्रधानमंत्री राजेन्द्र लिंगडेन सहित सभी मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया था।
नेपाल की राजनीति में व्यक्तिगत स्वार्थ हावी रहा है, जहां लोकतंत्र, विचारधारा, मार्क्सवाद एवं लेनिनवाद जैसे मुद्दों को कोई महत्व नहीं रह गया है। नेपाल में 9 मार्च को राष्ट्रपति का तथा 17 मार्च को उप-राष्ट्रपति का चुनाव होना है। सभी राजनीतिक पार्टियां चाहती हैं कि कोई ऐसा व्यक्ति इस पद पर बैठे जो लचीला व्यवहार करे। नया समीकरण भारत के लिए राजनीतिक एवं सामरिक दोनों ही दृष्टिकोण से लाभप्रद होगा। नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार राष्ट्रपति बनने से वहां की सत्ता पर पकड़ मजबूत होगी। 275 सदस्यीय नेपाली संसद में बहुमत के लिए 138 सदस्यों की जरूरत होगी।
नेपाली कांग्रेस के पास 89, सीपीएन-एमसी-32, आरएसपी-20, सीपीएन-यूनीफाइड सोशलिस्ट-10, जनमत पार्टी-6, लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी-4 एवं नागरिक उन्मुक्ति पार्टी-3 का समर्थन प्रचंड को प्राप्त है। इन सभी पार्टियों को मिलाकर प्रचंड को 164 सांसदों का समर्थन प्राप्त हो गया है। नेपाल का मध्यम वर्ग भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है। अमरीका और चीन के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए अमरीका की नेपाल में दिलचस्पी बढ़ गई है। वहां भारत की स्थिति मजबूत होने से अमरीका को भी फायदा होगा। नेपाल के वर्तमान सियासी हलचल के पीछे निश्चित रूप से भारत की भूमिका होगी। पाकिस्तान और श्रीलंका के चीनी कर्जजाल में फंसे देखकर शायद प्रचंड को अपनी गलती का एहसास हो गया है। कुल मिलाकर नेपाल के वर्तमान घटनाक्रम पर भारत को कड़ी नजर रखनी पड़ेगी, क्योंकि चीन कभी भी स्थिति बदलने का प्रयास कर सकता है।