भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी- लेनिनवादी) के पटना में आयोजित सम्मेलन से एक बार फिर विपक्षी एकता को मजबूत करने की चर्चा शुरू हो गई है। भाकपा (माले) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य का मानना है कि यदि बिहार के तर्ज पर राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का महागठबंधन बनता है तो वे 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगी दलों को परास्त करने में कामयाब होंगे और केंद्र में अगली सरकार गैर भाजपा समर्थक दलों को बनेगी।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो यहां तक कह दिया कि यदि विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिए यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी आगे आती हैं तो हम भाजपा को सौ सीटों पर समेट देंगे। राजद नेता और बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने भी कांग्रेस   को इस अभियान में सक्रिय भूमिका निभाने को कहा है ताकि विपक्षी पाॢटयों को एकजुट किया जा सके। अब देखना है कि नीतीश और तेजस्वी के संदेश  को कांग्रेस आलाकमान कितना महत्व देता है। वास्तव में देखा जाए तो विपक्ष के पास नीतीश कुमार ही एकमात्र नेता हैं, जो सिर्फ विपक्षी दलों को एक मंच पर ला ही नहीं सकते, बल्कि वह विपक्षी मुहिम से ओबीसी और दलित समाज को जोडऩे में अहम कड़ी बन सकते हैं। यदि वह कह रहे हैं कि भाजपा को सौ सीटों के भीतर समेट देंगे तो  हवा नहीं कह रहे हैं, परंतु सवाल है कि नीतीश कुमार विपक्ष को किस तरह से एकजुट करेंगे।

क्या विपक्ष की एकजुटता मुहिम में ममता बनर्जी, केजरीवाल, केसीआर और मायावती शामिल होंगी।  ये  लोग भले ही नीतीश कुमार के नाम पर एकजुट हो जाएं, परंतु उन्हें राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार्य नहीं होगा। आज विपक्ष की ओर से एक मजबूत नेता की जो तलाश की जा रही है, उसकी भरपाई नीतीश कुमार के रूप में हो सकती है। जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नीतीश कुमार को 2024 के चुनाव में विपक्ष का चेहरा बनाने का लक्ष्य तय किया है। ऐसे में माना जा रहा है कि नीतीश के चेहरे पर विपक्ष के ज्यादातर दल सहमत हो सकते हैं। नीतीश कुमार के पास एक लंबा राजनीतिक अनुभव है। नीतीश बिहार में 17 साल से ज्यादा समय से मुख्यमंत्री रहे हैं,लेकिन अभी तक उनके ऊपर किसी तरह का कोई भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है। नीतीश साफ-सुथरी छवि वाले नेता माने जाते हैं, इस बात को बीजेपी के नेता भी मानते हैं। नीतीश की यह सियायी ताकत उन्हें 2024 के चुनाव में विपक्षी एकता का सूत्रधार ही नहीं बल्कि मोदी के खिलाफ चेहरा बनने में भी मददगार साबित हो सकती है। नीतीश कुमार राजनीतिक रूप से काफी बैलेंस बनाकर चलने वाले नेताओं में हैं, जिसके चलते सहयोगी दलों को भी किसी तरह की कोई दिक्कत होने की संभावना नहीं दिखती।

देश की सियासत ओबीसी के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है। ऐसे में नीतीश कुमार ट्रंप कार्ड साबित हो सकते हैं,क्योंकि वो ओबीसी के कुर्मी समुदाय से आते हैं। बिहार से बाहर यूपी, मध्य प्रदेश, गुजरात व राजस्थान में कुर्मी बीजेपी के परंपरागत वोटर हैं। नीतीश कुमार विपक्ष का चेहरा बनते हैं तो बीजेपी की कुर्मी वोटर ही नहीं बल्कि ओबीसी समीकरण भी बिगड़ सकता है। साथ ही जातीय जनगणना से उन्हें काफी मजबूती भी मिली है। उल्लेखनीय है कि भाजपा ने नरेंद्र मोदी को ओबीसी चेहरे के तौर पर पेशकर अपने सियासी समीकरण को मजबूत किया था।

मौजूदा समय में विपक्षी खेमे से जो भी चेहरे प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदार माने जा रहे हैं, उसमें नीतीश कुमार को छोड़कर कोई दूसरा नेता ओबीसी नहीं है। ये नीतीश कुमार के लिए बड़ा प्लस प्वाइंट है।  2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ कांग्रेस के बिना विपक्षी एकता संभव नहीं है।  कांग्रेस के बगैर कोई गठबंधन बनता भी है तो बीजेपी को देशभर में चुनौती नहीं दे पाएगा। विपक्ष में कांग्रेस ही एकलौती पार्टी है, जिसका सियासी आधार देशभर में है। विपक्ष की ओर जो भी चेहरे सामने आ रहे हैं, कांग्रेस उनमें से किसी पर भी सहमत होती नहीं दिख रही है। ममता बनर्जी से लेकर केजरीवाल और केसीआर तक पर राजी नहीं है। बीजेपी को तीसरी बार सत्ता में आने से रोकने की मजबूरी में कांग्रेस नीतीश कुमार को स्वीकार्य कर सकती है और इसके पीछे कारण भी हैं।