सनातन हिंदू धर्मशास्त्रों में भगवान श्रीगणेशजी की महिमा अनंत है। हर शुभकार्यों के प्रारंभ में तथा पंचदेवों में श्री गणेशजी की पूजा-अर्चना सर्वप्रथम करने का विधान है। गौरीनंदन श्रीगणेशजी की आराधना से सुख-समृद्धि, खुशहाली मिलती है, साथ ही जीवन के समस्त संकटों का निवारण भी होता है। सुख-समृद्धि के लिए संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत रखने की धार्मिक परम्परा है। चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी तिथि के दिन किए जाने वाला व्रत संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी इस बार गुरुवार, 9 फरवरी को पड़ रही है।

प्रख्यात ज्योतिषविद्  विमल जैन ने बताया कि फाल्गुन कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि बुधवार, 8 फरवरी को अर्द्धरात्रि के पश्चात् 6 बजकर 24 मिनट पर लगेगी जो कि अगले दिन गुरुवार, 9 फरवरी को अर्द्धरात्रि के पश्चात् 6 बजकर 40 मिनट तक रहेगी। जिसके फलस्वरूप संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत गुरुवार, 9 फरवरी को रखा जाएगा, चंद्रोदय रात्रि 8 बजकर 55 मिनट पर होगा। श्रीगणेशजी की पूजा-अर्चना रात्रि में चंद्र उदय होने के पश्चात् चंद्रमा को अर्घ्य देकर किया जाएगा। 

पूजा का विधान : ज्योतिर्विद्  ने बताया कि संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत के दिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर अपने समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्त हो स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। तत्पश्चात् अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा-अर्चना करने के उपरांत अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गंध व कुश लेकर संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। संपूर्ण दिन निराहार रहते हुए व्रत के दिन सायंकाल पुनः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करके पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर श्रीगणेश जी की पंचोपचार, दशोपचार अथवा षोडशोपचार से पूजा-अर्चना करनी चाहिए। श्रीगणेशजी को दूर्वा एवं मोदक अति प्रिय है, इसलिए दूर्वा की माला, ऋतुफल, मेवे एवं मोदक अवश्य अर्पित करने चाहिए।

  मनोरथपूर्ति के उपाय : श्रीगणेशजी की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए उनकी महिमा में यशगान के रूप में श्रीगणेश स्तुति, संकटनाशन श्रीगणेश स्तोत्र, श्रीगणेश अथर्वशीर्ष, श्रीगणेश सहस्रनाम, श्रीगणेश चालीसा एवं श्रीगणेश जी से संबंधित अन्य स्तोत्र आदि का पाठ अवश्य करना चाहिए।