पाकिस्तान के तानाशाह शासक परवेज मुशर्रफ अब नहीं रहे। करीब नौ साल तक पाकिस्तान पर राज करने वाले जनरल मुशर्रफ का दुबई में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। आतंकवादी हमलों से लेकर अदालत की ओर से फांसी के आदेश तक को कई बार चकमा देने वाले मुशर्रफ की जान एमीलॉयडोसिस नामक एक बीमारी से हुई, जिसके कारण उनके सारे अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। उन पर उच्च राजद्रोह का आरोप लगाया गया था और 2019 में संविधान को निलंबित करने के लिए मौत की सजा दी गई थी। बाद में उनकी मौत की सजा को निलंबित कर दिया गया था। 2020 में लाहौर उच्च न्यायालय ने मुशर्रफ के खिलाफ नवाज शरीफ सरकार की ओर से की गई सभी कार्रवाइयों को असंवैधानिक घोषित कर दिया था, जिसमें उच्च राजद्रोह के आरोप पर शिकायत दर्ज करना और एक विशेष अदालत के गठन के साथ-साथ इसकी कार्यवाही भी शामिल थी। 1998 में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने परवेज मुशर्रफ को सेना प्रमुख बनाया था, लेकिन एक साल बाद ही 1999 में जनरल मुशर्रफ ने नवाज शरीफ का तख्तापलट कर दिया और पाकिस्तान के तानाशाह बन गए। उनके सत्ता संभालते ही नवाज शरीफ को परिवार समेत पाकिस्तान छोड़ना पड़ा था। दो साल तक मुशर्रफ बिना किसी संवैधानिकता के देश पर राज करते रहे। 2001 में 9/11 आतंकी हमला हुआ, जिसने पाकिस्तान को अमरीका के लिए बेहद अहम बना दिया। अमरीका ने अफगानिस्तान में अलकायदा के खिलाफ जंग छेड़ दी और मुशर्रफ उस जंग में अमरीका के साथी बन गए। अपने नौ साल लंबे शासन के दौरान उन्होंने अलकायदा  की ओर से अपनी जान पर किए गए कम से कम तीन हमले झेले। परवेज मुशर्रफ का जन्म 11 अगस्त 1943 को भारत की राजधानी दिल्ली के मशहूर पुरानी दिल्ली इलाके में हुआ था। चार साल बाद देश का बंटवारा हो गया और उनका परिवार पाकिस्तान चला गया। 18 साल की उम्र में मुशर्रफ सेना में भर्ती हो गए और पांच साल बाद कमांडो बन गए। 1971 में जब पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए और बांग्लादेश बना, उस साल वह भारत से करारी मात खाने वाली पाकिस्तानी सेना के अफसर  थे। करगिल युद्ध से ठीक पहले फरवरी 1999 में भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस से लाहौर गए थे और ऐतिहासिक शांति समझौता हुआ था, लेकिन मुशर्रफ ने करगिल कर उस शंति समझौते पर पानी फेर दिया। उसके बाद 2001 में उन्होंने खुद भारत-पाक संबंध बेहतर करने की बात कहते हुए भारत यात्रा की। तब भी भारत में वाजपेयी ही प्रधानमंत्री थे। दोनों नेताओं के बीच आगरा में शिखर वार्ता हुई, लेकिन यह वार्ता बुरी तरह नाकाम रही।  मुशर्रफ के पतन की शुरुआत 2007 में तब हुई जब उन्होंने मार्च में देश के मुख्य न्यायाधीश को बर्खास्त करने की कोशिश की। इस फैसले के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन शुरू हो गए और महीनों तक अफरा-तफरी मची रही जिसके बाद उन्होंने इमरजेंसी लगा दी। दिसंबर 2007 में विपक्ष की नेता बेनजीर भुट्टो का कत्ल कर दिया गया। इस घटना ने बिगड़ते माहौल में आग में घी का काम किया और 2008 में उनके सहयोगी दलों की चुनावों में करारी हार हुई। इसके बाद मुशर्रफ अकेले पड़ गए।  उनके खिलाफ महाभियोग की तैयारी चल रही थी जब उन्होंने इस्तीफा दे दिया और गिरफ्तारी के डर से देश छोड़ दिया। हालांकि 2013 में वह फिर से पाकिस्तान लौटे लेकिन उनका स्वागत किसी नायक की तरह नहीं अपराधी की तरह किया गया। उन पर कई मुकदमे दर्ज किए गए। तालिबान ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी और मीडिया ने उनका मजाक उड़ाया। उन्हें चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य ठहरा दिया गया और उन चुनावों में वही नवाज शरीफ जीतकर प्रधानमंत्री बने, जिनकी  कुर्सी मुशर्रफ ने 1999 में पलटी थी। शायद किसी शायर ने ठीक ही कहा है-

जिन्हें अपनी बुलंदियों पर नाज हो कमाल

उन्हें ढलता हुआ सूरज भी दिखाया जाए।