नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले महागठबंधन सरकार में सब कुछ ठीकठाक नहीं चल रहा है। प्रधानमंत्री बनने का सपना लेकर नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन तोड़कर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथ हाथ मिला लिया। लेकिन यहां भी नीतीश की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रहा है। राजद एवं जदयू के कुछ बड़बोले नेताओं के बयान ने सरकार के सामने अजीबोगरीब स्थिति पैदा कर दी है। शुरुआती दौर में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजद कोटे से आए दो मंत्रियों कार्तिकेय सिंह एवं सुधाकर सिंह को बाहर का रास्ता दिखाकर राजद पर दबाव बनाने की जरूर कोशिश की थी, किंतु बाद में राजद के नेताओं ने भी जदयू नेताओं पर हमला करने से कोई परहेज नहीं किया। रामचरित मानस पर शिक्षा मंत्री चन्द्रशेखर यादव के विवादित बयान पर गठबंधन की दोनों पार्टियां राजद व जदयू आमने-सामने आ गई। शीर्ष नेतृत्व ने भले ही चुप्पी साध रखी हो, किंतु अंदरखाने में सब कुछ ठीकठाक नहीं है। पूर्व कृृषि मंत्री सुधाकर सिंह ने पार्टी द्वारा दिए गए कारण बताओ नोटिस के जवाब में अपनी पार्टी को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। सुधाकर सिंह अपने बयान से पीछे हटने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं। नीतीश कुमार द्वारा बिहार की गद्दी छोड़ने में जितनी देर हो रही है उससे राजद के सब्र का बांध टूटता नजर आ रहा है। नीतीश कुमार वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में विपक्ष की तरफ से पीएम का उम्मीदवार होने का मन बनाए हुए हैं। किंतु अभी तक की राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए ऐसा कुछ नहीं लग रहा है। विपक्षी खेमे की तरफ से अभी तक नीतीश को कोई भाव नहीं मिल रहा है। इससे राजद का चिंतित होना स्वभाविक है, क्योंकि पार्टी तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है। अब तो जदयू के भीतर भी घमासान मचा हुआ है। जदयू संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा ने खुलेआम नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कुशवाहा ने संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए राजद और जदयू के बीच हुए गोपनीय डील को सार्वजनिक करने की मांग की है। वर्ष 2019 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से नाता तोड़कर अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) का जदयू में विलय कर महागठबंधन से नाता जोड़ लिया था। लेकिन अब उपेन्द्र कुशवाहा अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं। बिहार में बदलते राजनीतिक समीकरण को देखते हुए ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि  शायद कुशवाहा फिर भाजपा से हाथ मिला सकते हैं। वर्ष 2014 में कुशवाहा भाजपा के साथ थे। भाजपा भी चाहती है कि कुशवाहा फिर राजग के साथ आ जाए। बिहार में 7 प्रतिशत कुशवाहा मतदाता हैं। भाजपा उपेन्द्र कुशवाहा एवं आरसीपी सिंह के माध्यम से कुशवाहा मतदाताओं पर पकड़ बनाना चाहती है। दरभंगा में भाजपा कार्यकारिणी की बैठम में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा भी हुई है। बिहार के 17-18 प्रतिशत दलित वोटों को भाजपा चिराग पासवान एवं उनके चाचा पशुपति पारस तथा जीतनराम मांझी के माध्यम से साधना चाहती है। यही कारण है कि पिछले कुछ महीनों से चिराग पासवान भाजपा के समर्थन में काफी सक्रिय हो गए हैं। आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा पिछड़े एवं दलित वोटों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, ताकि महागठबंधन को जवाब दिया जा सके। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद पार्टी पसमांदा एवं बोहरा मुसलमानों को अपनी ओर खींचने के लिए पहल कर चुकी है। बिहार के तीन विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में दो सीटों पर मिली जीत ने भाजपा को काफी उत्साहित किया है। इससे नीतीश कुमार पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।