मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतेह अल सीसी भारत के तीन दिवसीय दौरे पर आए थे तथा गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि भी थे। उनके साथ मिस्र की सेना की एक टुकड़ी भी आई हुई थी जिसने परेड में हिस्सा लिया। भारत में अल सीसी का गर्मजोशी से स्वागत किया गया। मालूम हो कि मिस्र कोरोनाकाल के बाद से ही गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। कोरोना के कारण वहां का पर्यटन उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुआ है। मुस्लिम देश भी अब मिस्र की सहायता करने से कतराने लगे हैं। ऐसी स्थिति में भारत द्वारा मिस्र का हाथ थामने पर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। भारत ने मिस्र को सहायता देने के लिए आगे बढ़कर एक बड़ा सियासी दांव खेला है। मिस्र के माध्यम से भारत तुर्की, कतर और पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों की नकेल कसना चाहता है। मिस्र खाड़ी के देशों, यूरोप तथा उत्तरी अफ्रीका के केंद्र बिंदु में बसा हुआ है। एशिया और अफ्रीका को जोड़ने के लिए स्वेज नहर महत्वपूर्ण जलमार्ग है जो एशिया को भूमध्य सागर से जोड़ता है। स्वेज नहर से होकर दुनिया का आधा व्यापार होता है, जिस पर मिस्र का नियंत्रण है। चीन अफ्रीकी देशों में अपना प्रभाव तेजी से बढ़ा रहा है। अपनी पहुंच मजबूत करने के लिए चीन ने जिबूती में अपना सैन्य अड्डा भी बना रखा है। भारत भी अब अफ्रीकी देशों में अपनी पहुंच बढ़ा रहा है। ऐसी स्थिति में चीन के साथ तनातनी भी बढ़ सकती है। टकराव की स्थिति में स्वेज नहर भारत के लिए बड़ा ट्रंप कार्ड होगा। मिस्र के राष्ट्रपति ने भारतीय उद्यमियों से स्वेज नहर के इकोनॉमिक कोरिडोर में निवेश का अनुरोध किया है। इससे भारत का दबदबा वहां बढ़ेगा। अभी तक भारतीय कंपनियां मिस्र में लगभग साढ़े तीन डॉलर का निवेश कर चुकी हैं। अल सीसी की वर्तमान यात्रा के दौरान मिस्र की विभिन्न योजनाओं में निवेश पर सहमति भी बनी है। मिस्र में खाद्य संकट भी बना हुआ है तथा वहां महंगाई की दर 24 प्रतिशत से ज्यादा हो गई है। भारत मिस्र को गेहूं निर्यात कर वहां के लोगों के खाद्यान्न की जरूरतों को पूरा कर रहा है। रक्षा के क्षेत्र में भी दोनों देशों के संबंध लगातार प्रगाढ़ हो रहे हैं। भारत के लड़ाकू विमान तेजस के लिए दोनों देशों के बीच डील हो चुकी है। भारत के हल्के हेलिकॉप्टर तथा प्रलय मिसाइल के क्षेत्र में भी मिस्र दिलचस्पी दिखा रहा है। भारत मिस्र में अपनी मजबूत पैठ बनाकर खाड़ी क्षेत्रों को नियंत्रित कर सकता है। सउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात एवं इजरायल जैसे देशों के साथ भारत के संबंध पहले से ही प्रगाढ़ हैं। मिस्र के साथ पहले से ही भारत के संबंध मधुर रहे हैं। भारत की आजादी के बाद मिस्र ने कुछ ही दिनों बाद भारत को मान्यता दे दी थी। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में गठित गुट निरपेक्ष आंदोलन के संस्थापकों में मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति शामिल थे। जब भारत ने गोवा को पुर्तगाल से मुक्त कराने के लिए कार्रवाई की उस वक्त मिस्र ने पुर्तगाली सेना को भारत आने से रोकने के लिए स्वेज नहर का मार्ग बंद कर दिया था। कश्मीर के मुद्दे पर भी मिस्र ने हमेशा भारत का साथ दिया है। वर्तमान प्रवास के दौरान अल सीसी ने सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान को कटघरे में खड़ा किया था। कश्मीर पर मुखर तुर्की को घेरने की भारत की रणनीति में मिस्र बड़ी भूमिका निभा सकता है। भारत ने तुर्की के पड़ोसी देशों ग्रीस, साइप्रस, अर्मेनिया में अपने सामरिक संबंधों को बढ़ाकर बड़ा सियासी दांव खेला है। मिस्र भी इसी रणनीति की एक कड़ी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अल सीसी को गणतंत्र दिवस का मुख्य अतिथि बनाकर जो सियासी दांव खेला है उसके दूरगामी परिणाम होंगे। इससे चीन को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी।