भारत में एक ऐसी जगह है,  जहां हम अगर जाएं तो ऐसा अनुभव होगा कि हम 3-4 हजार वर्ष पहले के युग में पहुंच गए हैं। कर्णाटक के मत्तूर गांव की गलियों से गुजरते हुए वहां हर दूसरे घर से वेद मंत्रों की पावन ध्वनि सुनाई देती है। गली में खेलते हुए बच्चे जहां धोती और शिखा में दिखाई देते हैं वहीं पड़ोसी परस्पर संस्कृृत में बातचीत करते नजर आते हैं। तुंगा नदी के तट पर बसे मत्तूर गांव में वृक्षों के नीचे पठन-पाठन में लीन गुरु-शिष्यों की प्राचीन परम्परा के भी दर्शन हो जाते हैं। इस गांव ने कर्णाटक को अकेले तीस से ज्यादा संस्कृृत के प्रोफेसर भी दिए हैं और कई शहरों के बच्चे यहां संस्कृृत सीखने आते हैं, वह भी निःशुल्क। यहां के गुरुकुल के गुरुओं का कहना है कि वे आपको मात्र 20 दिनों में पूरी संस्कृृत सिखा देंगे लेकिन इसके लिए विद्यार्थी को गुरुकुल में ही रहना होगा। यहां न कोई होटल है, न ही गेस्ट हाउस या रेस्टोरेंट है। यहां के निवासी वैदिक काल की ही तरह अपने घरों में आगंतुकों के रहने का प्रबंध करते हैं। मत्तूर गांव की संस्कृृति के बारे में जानकर ऐसा कतई न सोचें कि यह गांव आधुनिक प्रगति से कटा हुआ रह गया। यहां इंटरनेट, कंप्यूटर खेल-कूद इत्यादि सहित 21वीं सदी की समस्त सुविधाएं उपलब्ध हैं। साथ ही वैदिक भारत की अनोखी झलक भी। काश, ऐसे और गांव भी हमारे देश में होते।