स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण में किए गए निवेश को दुनिया भर की सरकारें लाभ न कमाने वाला अनुत्पादक खर्च मानती हैं और यही कारण है कि वे इन मदों में कम से कम खर्च करने की कोशिश करती हैं। लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि स्वास्थ्य और पर्यावरण पर किया गया निवेश नागरिकों का उत्तम स्वास्थ्य सुनिश्चित करता है जो अपने देश के लिए ज्यादा उत्पादक साबित होते हैं। संगठन ने कहा है कि अमेरिकी स्वच्छ वायु नीति को लागू करने के लिए अमेरिका द्वारा किया गया हर एक डॉलर का निवेश 30 डॉलर आय के रूप में अमेरिकी नागरिकों के पास वापस आया है। यानी स्वास्थ्य-पर्यावरण पर किया गया निवेश भारी लाभ के रूप में वापस आया है, लेकिन इस तथ्य के बावजूद दुनिया भर के देशों में स्वास्थ्य पर किया गया निवेश बेहद कम है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि दुनिया भर के लगभग 40  फीसदी घरों में हाथ धुलने तक की बेसिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, जबकि कोरोना जैसी संक्रामक बीमारियों को रोकने के सन्दर्भ में इसे बेहद अहम माना जाता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार अगर इन मदों में खर्च को बढ़ाया जा सके तो कोरोना जैसी संक्रामक बीमारियों को फैलने में और इनके इलाज पर आने वाले खर्च को काफी कम किया जा सकता है। किसी देश की आर्थिक समृद्धि वहां के स्वस्थ नागरिकों पर निर्भर करती है, और नागरिकों का उत्तम स्वास्थ्य वहां की साफ हवा, स्वच्छ जल और साफ भोजन पर निर्भर करती है। लेकिन ये तीनों ही कारक तभी स्वस्थ रखे जा सकते हैं जब किसी देश का पर्यावरण और जंगल क्षेत्र बेहतर स्थिति में हो। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मनुष्य के अंदर जितने भी संक्रामक रोगों का संचरण होता है, उनमें से लगभग 60 फीसदी जंगली जानवरों के कारण पैदा होता है। ऐसे में अगर जंगली जानवरों को रहने के लिए उचित वन क्षेत्र उपलब्ध हो सके तो मनुष्यों में इनके संचरण की संभावनाएं उतनी ही कम हो सकेंगी। इसलिए पर्यावरण को बनाये रखना केवल जंगली जानवरों के लिए ही नहीं, मनुष्य के स्वास्थ्य की दृष्टि से भी ज्यादा उपयुक्त है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि प्रति वर्ष दुनिया भर में 70 लाख के करीब मौतें वायु प्रदूषण के कारण होती हैं। घर से बाहर निकलने वाले लगभग 90 फीसदी लोग उस हवा में सांस लेते हैं जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन नुकसानदायक मानता है। हवा के इस प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल, डीजल, केरोसिन तेल और अन्य) होता है।  लेकिन दुनिया भर की सरकारें इसके उपयोग को कम करने की बजाय इसके उपयोग के लिए हर साल लगभग 29,14,800 करोड़ भारतीय रुपये (400 बिलियन डॉलर) की भारी भरकम सब्सिडी देती हैं। इसके बदले में दुनिया को केवल प्रदूषण प्राप्त होता है। अगर जीवाश्म ईंधनों के उपयोग में दी जा रही इसी सब्सिडी को स्वास्थ्य-पर्यावरण पर खर्च किया जाए तो यह न केवल दुनिया को साफ-स्वच्छ वातावरण और लोगों को बेहतर स्वस्थ्य देने में मदद करेगा, बल्कि लाभ कमाने का बड़ा कारण भी साबित हो सकता है।  स्वच्छ ऊर्जा विशेषज्ञ (पूर्व ऊर्जा सचिव)अजय शंकर के अनुसार पेट्रोल-डीजल ईंधनों के उपयोग को कम करने के सन्दर्भ में सरकारों को यह भ्रम है कि अगर इनका उपयोग कम किया गया तो इससे गाड़ियों की बिक्री कम होगी, इसके कारण ऑटो सेक्टर और अन्य क्षेत्रों में बेरोजगारी बढ़ेगी।