सनातन धर्म में तैंतीस कोटि देवी-देवताओं में भगवान शिव देवाधिदेव महादेव की उपमा से अलंकृत हैं। भगवान शिवजी की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए शिवपुराण में अनेक व्रतों का उल्लेख मिलता है, जिसमें प्रदोष व्रत अत्यन्त शुभ फलदाई माना गया है। प्रख्यात ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि यह प्रदोष व्रत प्रत्येक मास में दो बार आता है। शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष की प्रदोष काल में व्याप्त त्रयोदशी तिथि के दिन यह व्रत रखा जाता है। सूर्यास्त की समाप्ति एवं रात्रि के प्रारंभ में पड़ने वाली त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है। सूर्यास्त के बाद तीन मुहूर्तपर्यन्त जो त्रयोदशी तिथि हो, उसी दिन यह व्रत रखा जाता है। सायंकाल प्रदोषकाल में भगवान् शिव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना का नियम है। विमल जैन ने बताया कि इस बार प्रदोष व्रत 4 जनवरी, बुधवार को रखा जाएगा। पौष मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 3 जनवरी, मंगलवार को रात्रि 10 बजकर 03 मिनट पर लगेगी जो कि अगले दिन 4 जनवरी, बुधवार को अर्द्धरात्रि 12 बजकर 01 मिनट तक रहेगी। जिसके फलस्वरूप प्रदोष व्रत 4 जनवरी, बुधवार को रखा जाएगा। प्रदोषकाल का समय सूर्यास्त से 48 मिनट या 72 मिनट तक माना गया है, इसी अवधि में भगवान् शिवजी की पूजा प्रारंभ करनी चाहिए।
व्रतकर्ता को इस दिन संपूर्ण दिन निराहार रहते हुए सायंकाल पुनः स्नान करने के उपरान्त स्वच्छ व धारण करना चाहिए तत्पश्चात् प्रदोष बेला में भगवान शिवजी की पूजा-अर्चना पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करनी चाहिए। व्रत के दिन व्रतकर्ता को दिन में शयन नहीं करना चाहिए, परनिन्दा व व्यर्थ के वार्तालाप से बचना चाहिए।
ऐसे रखें प्रदोष व्रत :ज्योतिषविद् ने बताया कि व्रतकर्ता को प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्त होकर स्नान-ध्यान, पूजा-अर्चना के पश्चात् अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गंध व कुश लेकर प्रदोष व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
दिनभर निराहार रहकर सायंकाल पुनः स्नान करके प्रदोष काल में भगवान शिवजी की विधि-विधान पूर्वक पंचोपचार, दशोपचार अथवा षोडशोपचार पूजा-अर्चना करनी चाहिए।