सनातन धर्म में पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीगणेशजी की महिमा अनंत है। गौरीपुत्र श्रीगणेशजी की आराधना से सुख-समृद्धि, खुशहाली मिलती है, साथ ही जीवन के समस्त संकटों का निवारण भी होता है। हिन्दू धर्मशास्त्रों में प्रथम पूज्य देव भगवान श्रीगणेशजी को सर्वोपरि माना जाता है। पंचदेवों में भी श्रीगणेश जी का स्थान प्रमुख है। हर शुभकार्यों के प्रारंभ में श्री गणेशजी की पूजा-अर्चना सर्वप्रथम करने का विधान है। संकट के निवारण एवं सुख-समृद्धि के लिए संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी के व्रत की विशेष महिमा है। यह व्रत महिला एवं पुरुष के लिए समान रूप से फलदाई है। प्रख्यात ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि इस बार पौष कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि रविवार, 11 दिसंबर को सायं 4 बजकर 15 मिनट पर लगेगी जो कि अगले दिन सोमवार, 12 दिसंबर को सायं 6 बजकर 49 मिनट तक रहेगी। चंद्रोदय रात्रि 07 बजकर 47 मिनट पर होगा। फलस्वरूप संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत रविवार, 11 दिसंबर को रखा जाएगा। रात्रि में चंद्र उदय होने के पश्चात् चंद्रमा को अघ्र्य देकर उनकी पूजा-अर्चना की जाएगी।

श्रीगणेशजी को करें ऐसे प्रसन्न: विमल जैन के अनुसार संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत के दिन प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए। प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करके स्वच्छ वस्ïत्र धारण करना चाहिए। तत्पश्चात् व्रतकर्ता को अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गंध व कुश लेकर श्रीगणेश चतुर्थी के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। संपूर्ण दिन निराहार रहते हुए व्रत के दिन सायंकाल पुन: स्नान करके श्रीगणेश जी की पंचोपचार, दशोपचार अथवा षोडशोपचार से पूजा-अर्चना करनी चाहिए। श्रीगणेशजी को मोदक एवं दूर्वा अति प्रिय है, इसलिए दूर्वा की माला, ऋतुफल, मेवे एवं मोदक अवश्य अॢपत करने चाहिए। 

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